अंतर मन की रहस्य.. सामान्य कहलाये जाने वाले ज्यादातर लोग अपने दिमाग को रोज तोड़ रहे हैं, वे उसे दबाव, तनाव, व्यग्रता, चिंता आदि कई नाम देते हैं, शून्य और अंनत की परिभाषा क्या है?:- नया भारत...

अंतर मन की रहस्य.. सामान्य कहलाये जाने वाले ज्यादातर लोग अपने दिमाग को रोज तोड़ रहे हैं, वे उसे दबाव, तनाव, व्यग्रता, चिंता आदि कई नाम देते हैं, शून्य और अंनत की परिभाषा क्या है?:- नया भारत...

NBL..15 सितंबर 2021 नया भारत न्यूज से. लोकेश्वर प्रसाद वर्मा.. आज हमारे सज्जन प्रिय पाठकों के लिए ज्ञान से भरा रहस्यमयी लेख न्यूज लाये है जिसमे दर्शन भी है और प्रेरणा भी है, खबर पढ़े आगे विस्तार से...

दर्शन-- भीतरी स्थिति के मामले में कोई अपंग नही है। ज्ञानी कहते है- आपकी हड्डिया टूटती है, यह बहुत बड़ी परेशानी है और दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन सामान्य कहलाये जाने वाले ज्यादातर लोग अपने दिमाग को रोज तोड़ रहे है। वे उसे दबाव, तनाव, व्यग्रता, चिंता आदि कई नाम देते हैं, लेकिन किसी वास्तव में वे किसी न किसी रूप में अपने दिमाग को तोड़ रहे है।

यह शरीर एक यांत्रिक ( मैकेनिकल ) प्रक्रिया है। इसके साथ कभी - कभार कुछ चीजें गलत हो सकती है। यह जन्म के समय सामान्य हो सकता है और बाद में इसमे कुछ गड़बड़ हो सकती है, या गर्भ में ही, निर्माण के दौरान कुछ गलत हो सकता है। इसका उस व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। इसका संबंध बहुत सी अलग-अलग चीजो से है क्योंकि यह प्रक्रिया इतनी ज्यादा जटिल है, की इसमे कुछ चीजें गलत हो सकती है।

कोई अन्य यह तय नही कर सकता कि मैं अपने अंदर कैसे रहता हूं। इस अर्थ में देखा जाए, तो कोई भी अपंग नही है। लेकिन इससे यह तय नही होना चाहिए कि आप अपना जीवन कैसे जीते हैं। हम शाररिक रूप से कैसे रहते है, यह बहुत सी बातों पर निर्भर है। लेकिन हमारे सिवाय कोई भी यह तय नही कर सकता कि हम अपने आप मे कैसे रहते है। कोई अन्य यह तय नही कर सकता कि मैं अपने अंदर कैसे रहता हूं। इस अर्थ में देखा जाए, तो कोई भी अपंग नही है।

प्रेरणा.. स्वार्थी स्वभाव हमेशा से बुरा माना गया है। ज्ञानी कहते है कोई चीज न बुरी होती न अच्छी। जैसे स्वार्थी होने का भी उजला पक्ष है। लेकिन हमें असीमित भाव से स्वार्थी होना होगा। कम से कम स्वार्थ में तो पूरे हो सके।

हम जीवन के कई पहलुओं में पूरा होना ही नही चाहते। कम से कम पूरी तरह से स्वार्थी तो बने। अगर आप सबसे ऊँचे मुकाम तक जाना चाहते है या अंनत को पाना चाहते है तो इसके दो उपाय हो सकते है- आप या तो शून्य हो जाए या फिर अंनत हो जाए।

ये दोनों अलग नही है। निःस्वार्थी होने की कोशिश में आप खुद को नीचे ले आते है- आप खुद को दस से पाँच पर ले आते है पर आप खुद को पूरी तरह से विलीन नही कर सकते। या तो आपको शून्य बनना होगा, या फिर अंनत बनना होगा।

भक्ति का रास्ता खुद को घुला देने का है। आप समर्पण करके शून्य हो जाते है- तब कोई समस्या नही रहती। या आप हर चीज को अपने एक अंश की तरह संजो लेते है और सब कुछ बन जाते है- तब आपको कोई समस्या नही रहती।

पर जब आप अपने बारे में बात करते हैं, तो एक सत्ता सामने आ जाती है, इस तरह शून्य होने का सवाल ही नही पैदा होता। आपके लिए अंनत होना ही बेहतर होगा। यह आपके लिए एक सरल रास्ता होगा।