छत्तीसगढ़

CG High Court ब्रेकिंग : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बालिग बेटी को भी मिलेगा भरण-पोषण…..

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने पारिवारिक विवाद और भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच ने, मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दायर एक पिता की आपराधिक पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए बालिग बेटी को बतौर भरण-पोषण प्रति महीने पांच हजार रुपये देने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यदि बेटी बालिग भी हो चुकी है, तो भी पिता उसे भरण-पोषण राशि देने की अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।

पढ़िए क्या है पूरा मामला?

छत्तीसगढ़ कोरिया और MCB मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता गोरखनाथ यादव, निवासी ग्राम तेंदुआ, पटना ने फैमिली कोर्ट मनेंद्रगढ़ द्वारा 13 फरवरी 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कोर्ट ने याचिकाकर्ता की बेटी कु. प्रिया, निवासी ग्राम अखराडांड, खड़गवां को प्रति महीने पांच हजार रुपये बतौर भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। फैमिली कोर्ट ने सबसे पहले 8 नवंबर 2016 को बेटी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दो हजार रुपये प्रति महीने भरण-पोषण का आदेश दिया था। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता Cr.P.C. की धारा 127 के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए 15 दिसंबर 2023 को इस राशि को बढ़ाकर पांच हजार रुपये प्रति महीने कर दिया था। जब बेटी ने राशि को बढ़ाकर 15 हजार रुपये करने की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की,तब पिता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 146 के तहत एक काउंटर आवेदन लगाकर भरण-पोषण की राशि को पूरी तरह से बंद करने की मांग की। तब पिता ने कोर्ट से कहा,

वह मेरी कानूनी पत्नी की संतान नहीं और अब बालिग है। पिता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, लड़की की मां, कानूनी रूप से ब्याही पत्नी नहीं है और पूर्व के सिविल मामलों में भी यह रिश्ता साबित नहीं हुआ था।

प्रिया ने इस अधिनियम के तहत किया दावा

याचिकाकर्ता प्रिया के अधिवक्ता ने कहा, याचिकाकर्ता बालिग हो चुकी है, वह 20 साल की है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अधिवक्ता ने कहा, बालिग अविवाहित बेटी केवल ‘हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956’ की धारा 20 (3) के तहत ही दावा कर सकती है, धारा 125 Cr.P.C. के तहत नहीं। पिता ने कोर्ट में तर्क दिया, लड़की की मां के पास पर्याप्त कृषि भूमि और आय का मजबूत साधन है, जिससे वे अपना खर्च चला सकती हैं। उसके ऊपर, अपनी वर्तमान पत्नी, चार बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी है।

पढ़िए हाई कोर्ट ने पिता की याचिका को क्यों की खारिज और क्या कहा?

याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह पाया, वर्ष 2016 से ही फैमिली कोर्ट द्वारा बेटी को लगातार भरण-पोषण राशि दी जा रही है, जिसे पिता ने पहले कभी ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी थी। इसलिए अब नए सिरे से रिश्ते या वैधता पर सवाल उठाना स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, पिता की कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी संतान का भरण-पोषण करे। इस टिप्पणी के साथ पिता की याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले के अनुसार बेटी को बतौर भरण-पोषण हर महीने पांच हजार रुपये की राशि का भुगतान करने का निर्देश देते हुए पिता की याचिका को खारिज कर दिया है।

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