छत्तीसगढ़

CG High Court ब्रेकिंग : हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 11 साल बाद रद्द की उम्र कैद की सजा, संदेह का लाभ देते हुए किया बरी, इस मामले में हुई थी गिरफ्तारी……

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने बलौदाबाजार के चर्चित हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट के उम्रकैद के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने मृतक की पत्नी और प्रेमी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ ‘लास्ट सीन’ आखिरी बार साथ देखे जाने और अवैध संबंधों से जुड़े संदेह के आधार पर हत्या का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता। जब तक परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और अटूट श्रृंखला आरोपी की ओर ही इशारा न करे, तब तक दोषसिद्धि कानूनन टिक नहीं सकती। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने सत्र न्यायालय, बलौदाबाजार के 18 नवंबर 2015 के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपी नरसिंह यादव उर्फ शेरा और टोपबाई आदिल को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

पढ़िए क्या है मामला?

अभियोजन के अनुसार पलारी थाना क्षेत्र के ग्राम छेरकापुर निवासी सुमेर सिंह आदिल की पत्नी टोपबाई आदिल के गांव के ही नरसिंह यादव से अवैध संबंध था। इसी कारण दोनों ने मिलकर सुमेर सिंह की हत्या की साजिश रची। 25 जुलाई 2014 को सुमेर सिंह लापता हो गया था। दो दिन बाद 27 जुलाई को उसका शव मगरचबा गांव के कोरसी नाले में मिला। पोस्टमार्टम में गला घोंटकर हत्या की पुष्टि हुई। जांच के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर चार्जशीट पेश की। मामले की सुनवाई के बाद सत्र न्यायालय ने 18 नवंबर 2015 को नरसिंह यादव को हत्या और साक्ष्य मिटाने तथा टोपबाई को आपराधिक षड्यंत्र का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। अभियोजन केवल एक गवाह के बयान पर निर्भर है, जिसने घटना वाले दिन दोनों को पान दुकान पर साथ देखा था। इसके अलावा हत्या से जोड़ने वाला कोई वैज्ञानिक या प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। राज्य शासन ने तर्क दिया कि पोस्टमार्टम से हत्या सिद्ध है। आरोपियों के बीच कथित अवैध संबंध हत्या का मजबूत कारण था और मृतक को आखिरी बार मुख्य आरोपी के साथ देखा गया था। इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला सही है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, गवाह ने केवल मृतक और आरोपी को पान दुकान पर साथ देखा था। उसने हत्या होते नहीं देखी और न ही उसके बाद दोनों कहां गए, इसकी जानकारी दी। मृतक का शव लगभग दो दिन बाद मिला। इतने लंबे अंतराल में किसी तीसरे व्यक्ति की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा, लास्ट सीन का सिद्धांत तभी प्रभावी होता है, जब आरोपी और मृतक के साथ देखे जाने तथा शव मिलने के बीच का समय इतना कम हो कि किसी अन्य व्यक्ति की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाए।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, कथित अवैध संबंध हत्या का संभावित कारण हो सकता है, लेकिन यह स्वयं में अपराध का निर्णायक प्रमाण नहीं है। जब तक अन्य ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हों, केवल मकसद के आधार पर हत्या का दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन संदेह से परे अपराध साबित करने में असफल रहा। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी है और कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब हैं।

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