जितेंद्र मीणा बोले—धर्म के नाम पर आदिवासियों को बांटने की कोशिश स्वीकार नहीं, जल-जंगल-जमीन और संस्कृति की रक्षा के लिए संविधान ही मजबूत आधार
Chhattisgarh धमतरी नगरी विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर नगरी के कृषि उपज मंडी परिसर में जिला स्तरीय कार्यक्रम बड़े उत्साह, उमंग और आदिवासी संस्कृति के रंग में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में जिलेभर से हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग जुटे। पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य, सामाजिक मुद्दों और आदिवासी अधिकारों से जुड़े विषयों ने पूरे आयोजन को विशेष बना दिया। सुबह से ही नगरी में आदिवासी समाज के लोगों की भीड़ नजर आई और देर शाम तक कृषि उपज मंडी परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर चलता रहा।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जितेंद्र मीणा ने अपने संबोधन में कहा कि विश्व आदिवासी दिवस सिर्फ आदिवासियों का एजेंडा है, मिशनरियों का नहीं। उन्होंने कहा कि जो लोग इस दिवस को किसी अन्य एजेंडे से जोड़कर देखते है, वे आदिवासियों को आपस में लड़ाने की कोशिश कर रहे है। डिलिस्टिंग के जरिए आदिवासी समाज को बांटने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी हर धर्म में हो सकता है, लेकिन धर्म के नाम पर आदिवासियों के बीच बंटवारे को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

जितेंद्र मीणा ने कहा कि आदिवासी इस देश के मूल निवासी है। उन्होंने कहा कि यह समझने की आवश्यकता है कि कौन मूल निवासी है और कौन बाहरी। उन्होंने आदिवासियों की जमीन के लगातार प्रभावित होने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि मध्यप्रदेश हो या छत्तीसगढ़, आदिवासी जमीन के सवाल पर गंभीर चुनौती का सामना कर रहे है।उन्होंने कहा कि संविधान के जरिए ही आदिवासी अपनी जमीन और अधिकारों को सुरक्षित रख सकते है। ग्रामसभा की अनुमति के बिना आदिवासियों की जमीन छीनी नहीं जा सकती। उन्होंने कहा कि हमारी जमीन ही हमारे जीवन का मूल अधिकार है। जमीन रहेगी तो हमारी संस्कृति रहेगी और संस्कृति रहेगी तो हमारी पहचान सुरक्षित रहेगी।प्रोफेसर मीणा ने टाइगर रिजर्व और अभ्यारण्य के नाम पर आदिवासियों के विस्थापन का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि संरक्षण के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने विस्थापन की समस्या खड़ी हो रही है। हमारे लोग विस्थापन के कारण प्रताड़ित हो रहे है।आदिवासियों के अधिकारों और उनकी जमीन की रक्षा के लिए समाज को संवैधानिक और कानूनी तरीके से अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। उन्होंने जनगणना को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जनगणना के जरिए राजनीति की जा रही है, जिसे समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जनगणना में आदिवासी भाषाओं को लेकर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि हमारी भाषाओं की गणना नहीं होगी तो आने वाली पीढ़ियों के सामने अपने पूर्वजों के ज्ञान, संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखने की चुनौती होगी। उन्होंने कहा कि जनगणना की प्रक्रिया के भीतर कई ऐसे पहलू है, जिन पर आदिवासी समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 11 बजे मां दंतेश्वरी मंदिर में सेवा-अर्जी के साथ हुई। इसके बाद जग जंवारा जात्रा का शुभारंभ किया गया। आंगापेन की अगुवाई में निकली जात्रा में बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और युवाओं ने हिस्सा लिया। जात्रा में महिलाएं सिर पर जंवारा लेकर पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुईं। युवाओं ने आदिवासी धुनों पर नृत्य करते हुए अपनी संस्कृति और परंपरा का प्रदर्शन किया। पारंपरिक लोकनृत्य और वेशभूषा ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। जात्रा के दौरान आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत की जीवंत झलक देखने को मिली।
कृषि उपज मंडी परिसर में देर शाम तक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां होती रहीं। जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंचे समाज के लोगों ने कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भागीदारी की।
सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष जीवराखन मरई ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति को पूजता आया है। हमारे पूर्वजों ने अन्याय के खिलाफ हमेशा संघर्ष किया और जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। आज आवश्यकता है कि हम अपने पूर्वजों के संघर्ष को याद करें और उनके बताए रास्ते पर चले।

उन्होंने कहा कि जिले के सीतानदी क्षेत्र में टाइगर रिजर्व के नाम पर कई गांवों को विस्थापित करने की तैयारी की जा रही है। इसके खिलाफ समाज को कानूनी लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने कहा कि नगरी क्षेत्र पांचवीं अनुसूची में आता है और यहां दो बड़े गांवों को नगर पंचायत बनाने की तैयारी की जा रही है, जिसका भी समाज की ओर से विरोध किया जाएगा।
जिला पंचायत अध्यक्ष अरुण सार्वा ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जल, जंगल और जमीन को सहेजकर रखने वाला आदिवासी समाज है। समाज को अब रचनात्मक कार्यों की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। उन्होंने उन्नत कृषि के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त बनने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गांव-गांव अभियान चलाकर रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर विकल्प तलाशने होंगे। युवाओं को रोजगार के नए अवसरों से जोड़ने तथा लोगों की आजीविका को मजबूत करने की दिशा में सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक विकास के साथ आर्थिक मजबूती भी जरूरी है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सिहावा विधायक अम्बिका मरकाम शामिल हुईं। विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला पंचायत अध्यक्ष अरुण सार्वा, नगर पंचायत अध्यक्ष बलजीत छाबड़ा, पूर्व विधायक डॉ. लक्ष्मी ध्रुव, श्रवण मरकाम, पिंकी शिवराज शाह एवं प्रेमलता नागवंशी मौजूद रहे।

सिहावा विधायक अम्बिका मरकाम ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आदिवासी समाज की एकता, अधिकारों और सामाजिक विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज को अपनी संस्कृति, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करने के लिए संगठित होकर आगे बढ़ना होगा। नगर पंचायत अध्यक्ष बलजीत छाबड़ा ने विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराएं क्षेत्र की पहचान हैं। इन परंपराओं को संरक्षित रखने के साथ समाज के विकास के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
कार्यक्रम में सर्व आदिवासी समाज के तहसील अध्यक्ष उमेश देव, रामप्रसाद मरकाम, सुरेंद्र ध्रुव, माधव सिंह ठाकुर, मनोज साक्षी, जयपाल ठाकुर, शिवप्रसाद कोर्राम, डॉ. ए.आर. ठाकुर, नारायण नेताम, चुम्मन लाल ध्रुव, टिकेश्वर ध्रुव, रैनलाल देव, प्रमोद कुंजाम, डोमार सिंह ध्रुव, गेवा राम नेताम, हरख मंडावी, साधु राम नेताम, स्कंध ध्रुव, उदय नेताम, एच.आर. ध्रुव, सुरेश ध्रुव, नेमीचंद देव, वेदप्रकाश ध्रुव, खिलेन्द्र पडोटी, रामेश्वर मरकाम, हेमंत ध्रुव, बंटी मरकाम, भैयालाल ध्रुव, सुरेंद्र राज ध्रुव, हृदयलाल नाग, संत नेताम, शशिकला ध्रुव, दलगंजन मरकाम, हलधर शार्दूल, पूरन नेताम, शत्रुपा तमोवंशी, शत्रुघन साक्षी, नरेश छेदैया, शैल नेताम, अरविंद नेताम, संतोष गंगेश, नरसिंग मरकाम, सत्यवती नेताम, हेमलाल मरकाम, उत्तम नेताम, खिंजन कश्यप, अमृत बारला, बंशी श्रीमाली, श्रवण सोरी, मनराखन मरकाम, दयाराम वेदकार, पीला राम नेताम, छेदप्रकाश कौशिल, राम सिंह समरथ, सुनाराम कमार, नरेश छेदैया सहित जिलेभर से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग उपस्थित रहे।

