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विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में आस्था का महाकुंभ! कांटों के झूले पर विराजीं मां काछनदेवी, 75 दिवसीय महापर्व की अनुमति पूजा में उमड़ा जनसैलाब..!

बस्तर जगदलपुर। विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा महापर्व की पारंपरिक रस्मों का शुभारंभ गहरी धार्मिक आस्था और उत्साह के साथ हो गया है। शनिवार को महापर्व की महत्वपूर्ण रस्म काछन गादी विधि-विधान से संपन्न हुई। इस दौरान कांटों के झूले पर विराजित मां काछनदेवी से दशहरा आयोजन की अनुमति प्राप्त की गई।

करीब सात सदियों पुरानी इस परंपरा में पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू ने मां काछनदेवी का स्वरूप धारण किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अनुष्ठान के दौरान देवी का वास कन्या के शरीर में होता है। जब देवी स्वरूप बालिका को बेल के नुकीले कांटों से तैयार झूले पर लिटाया गया, तो उपस्थित जनसमूह श्रद्धा और उत्साह से भर उठा।

राजा कमलचंद भंजदेव ने लिया मां का आशीर्वाद

अनुष्ठान के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने काछनदेवी के समक्ष शीश झुकाकर आशीर्वाद लिया। इसके बाद उन्होंने गोलबाजार पहुंचकर मिरगान समुदाय की इष्ट देवी मां रैला देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

पूरे आयोजन के दौरान काछन गुड़ी और गोलबाजार क्षेत्र पारंपरिक वाद्ययंत्रों एवं मोहरी बाजा की गूंज से गुंजायमान रहा। श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक रस्म में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

 जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की रही मौजूदगी

इस ऐतिहासिक अवसर पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, देश-विदेश से पहुंचे पर्यटकों और बस्तर अंचल के श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। कार्यक्रम में सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांडवी, महापौर संजय पाण्डे, कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी बस्तर रेंज बी.एन. मीणा, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

आदिवासी संस्कृति और आस्था का प्रतीक है बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की जीवंत आदिवासी संस्कृति, ऐतिहासिक राजपरंपरा और मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है। इस महापर्व में समाज के विभिन्न समुदायों की सहभागिता इसकी विशिष्ट पहचान है।

काछन गादी की रस्म के साथ ही बस्तर दशहरा के आगामी पारंपरिक अनुष्ठानों का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब अगले 75 दिनों तक बस्तर में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन श्रद्धा एवं परंपरा के साथ संपन्न होंगे।

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