छत्तीसगढ़

CG High Court ब्रेकिंग : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी, पति से अधिक कमाती है, फिर भी उसे अदालती खर्च और यात्रा भत्ता पाने का है अधिकार…..

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण और अदालती खर्च को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। डिवीजन बेंच ने कहा है, भले ही पत्नी सरकारी नौकरी में हो और उसकी आय पति से अधिक हो, फिर भी उसे मुकदमे की पैरवी के लिए आवश्यक यात्रा, भोजन और अदालती खर्च पाने से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत मिलने वाली यह राशि जीवन-यापन का स्थाई गुजारा भत्ता नहीं, बल्कि मुकदमे में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सीमित सहायता है।

याचिकाकर्ता पति आशीष राय ने सूरजपुर परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामलेे की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु के डिवीजन बेंच में हुई। याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पति की याचिका को खारिज कर दिया है।

जाने पूरा मामला

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय का विवाह 9 फरवरी 2020 को हुआ था। बाद में दोनों के बीच विवाद के कारण पति ने परिवार न्यायालय सूरजपुर में धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई के दौरान पत्नी ने धारा 24 के तहत परिवार न्यायालय में आवेदन पेश कर, अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की थी।

पति आशीष राय ने सूचना के अधिकार RTI के तहत पत्नी के वेतन की जानकारी निकालकर परिवार न्यायालय के सामने पेश किया था। उसने बताया कि उसकी पत्नी शासकीय शिक्षिका है, महीने की सैलेरी 71,482 रुपये है। पति ने कहा, वह एक संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्यरत है और उसकी मासिक आय केवल 25,700 रुपये के आसपास है। याचिकाकर्ता ने कहा, पत्नी की आय उससे तीन गुना अधिक है, इसलिए वह किसी भी वित्तीय सहायता की हकदार नहीं है।

मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी के आवेदन पर विचार करते हुए परिवार न्यायालय ने कहा, पत्नी स्वयं का भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम है, इसलिए उसे मासिक गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। फैमिली कोर्ट ने मुकदमे की पैरवी के लिए पत्नी को 3,000 रुपये एकमुश्त अदालती खर्च और कोर्ट में पेशी के दौरान आने-जाने व भोजन के लिए 1,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था।

फैमिली कोर्ट के फैसले को पति ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती

परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए पति ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश शुक्ला, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल उपस्थित हुए। अधिवक्ता शुक्ला ने कहा, परिवार न्यायालय ने कानून की गलत व्याख्या की है, क्योंकि धारा 24 का मूल सिद्धांत “स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थता” पर आधारित है।

याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, वैवाहिक मुकदमों में पक्षकारों को बार-बार अदालत आना पड़ता है। यात्रा, भोजन और अन्य आकस्मिक व्यय होना स्वाभाविक है। कोर्ट ने कहा, परिवार न्यायालय द्वारा दी गई राशि जीवन निर्वहन के लिए नहीं,बल्कि अदालती कार्यवाही में शामिल होने के लिए लगने वाले खर्च के लिए है। कोर्ट ने कहा है, जब तक निचली अदालत का फैसला मनमाना या कानून के विपरीत न हो, अपीलीय अदालत को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।

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