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सतयुग में उम्र पूरी होते ही लोग अपने देश (प्रभु के पास) पहुँच जाते थे – बाबा उमाकान्त महाराज

On: March 21, 2025 6:19 PM
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सतयुग में उम्र पूरी होते ही लोग अपने देश (प्रभु के पास) पहुँच जाते थे – बाबा उमाकान्त महाराज

कर्मों का विधान क्यों बनाया गया ?

उज्जैन। परम सन्त बाबा उमाकान्त महाराज ने होली के सतसंग में बताया कि शुरू (सतयुग) में कर्मों का कोई नियम ही नहीं बना था। आज जो कर्मों की सजा जीव भोग रहा है, पहले कोई नहीं भोगता था। निरोगी काया थी और दिमाग में कोई टेंशन नहीं थी। प्रकृति लोगों को भरपूर देती थी। जरूरत पड़ने पर बादल खेत में अपने आप पानी बरसा देते थे। लोग एक बार बोते थे और 27 बार उसी फसल को काटते थे। उस समय कोई परेशानी नहीं थी, लोग भजन (साधना) में ज्यादा समय देते थे। सबकी दिव्य दृष्टि खुली हुई थी जिससे ऊपर के लोकों में आते-जाते रहते थे। मृत्यु लोक के ऊपर भी बहुत से लोक हैं – सूर्यलोक, चंद्रलोक, स्वर्गलोक, बैकुंठलोक, फिर उसके बाद में शिवलोक, ब्रह्मालोक, विष्णु लोक, आद्या लोक, काल भगवान का लोक, उसके ऊपर ब्रह्मलोक, पारब्रह्म लोक, महाकाल लोक, सतलोक, अलख लोक, अगम लोक, अनामी लोक, बहुत सारे लोक हैं।

कर्मों के विधान का इतिहास

मनुष्य की उम्र सतयुग में एक लाख वर्ष थी। तो एक लाख वर्ष जब पूरा हो जाता था तब अपने देश (सतलोक), अपने घर, अपने मालिक के पास लोग पहुंच जाते थे। तब काल भगवान ने सोचा कि इस तरह तो सब अपने देश चले जाएंगे लेकिन अगर कर्मों का विधान बन जाए तो यह जीव फंस जाएंगे। अब वे कर्मों का विधान नहीं बना सकते थे क्योंकि इतनी पावर (शक्ति) नहीं थी तो अपने ऊपर के लोक के जो मालिक हैं, जिनको ब्रह्म कहा गया है, उनसे प्रार्थना किया और कहा कि आप हमारी मदद कीजिए कर्मों का विधान बनाने में। तो फिर ब्रह्म ने ही अच्छे और बुरे कर्मों का नियम बनवा दिया। ब्रह्म के मुंह से जो आवाज निकली वह ब्रह्मा जी को सुनाई दी, कहा गया है – “वेद पाय ब्रह्मा हरसाई”। फिर ब्रह्मा जी से ऋषि मुनियों को आदेश मिला कि यह तुम सब को बता दो। तो ऋषि मुनियों ने आम जनता को भी कर्मों का विधान बता दिया।

कर्मों की सजा और सन्तों का धरती पर आगमन

जैसे मोतियाबिंद हो जाता है तो सामने की ही चीज साफ नहीं दिखाई पड़ती है; पर्दा पड़ जाता है। इसी तरह आंखों के ऊपर जब कर्मों का पर्दा लग जाता है तब ऊपर की चीजें (ऊपर के लोक) नहीं दिखाई पड़ती है। तो शुरू में तो कर्म थे ही नहीं तो सब की तीसरी आँख खुली हुई थी और कर्मों का विधान बनने के बाद, धीरे-धीरे समय बीतता गया तो वह आंख बंद होने लग गई। सतयुग के बाद त्रेता, त्रेता के बाद द्वापर आया और फिर बहुत समय निकल जाने के बाद कलयुग आया, तो कलयुग में आते-आते एकदम से मोतियाबिंद पक गया; कर्मों का मोटा जाला लग गया। अब कर्म जब खराब होते हैं तो कर्मों की सजा मिलती है, तो नरकों में जीव जाने लग गए। नरकों में बड़ी मार पड़ती है, बड़ी तकलीफ होती है। तो जब जीव वहाँ पर चिल्लाया, प्रभु से प्रार्थना किया, तब उन्होंने सन्तों को इस धरती पर भेजा और सन्त जब आए तब उन्होंने रास्ता निकाला। जीवों को अपने घर, अपने देश पहुंचाने का, जन्म मरण से छुटकारा दिलाने का।

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