CG हाई कोर्ट का बड़ा फैसला : पत्नी पर दूसरे मर्द से रिश्ते के आरोप पर भी नहीं टलेगी पति की जिम्मेदारी, पत्नी-बच्चे को देना होगा गुजारा भत्ता……

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच ने कहा है, पत्नी के किसी अन्य पुरुष से कथित संबंध, अलग रहने और समाज के स्तर पर हुए कथित तलाक की दलील के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण को केवल आरोपों के आधार पर रोका नहीं जा सकता। ऐसे आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने बालौदाबाजार-भाटापारा जिले के गेवेंद्र साहू की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए बेमेतरा फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 1000 रुपये और दो वर्षीय बेटे को 500 रुपये प्रतिमाह, कुल 1500 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था।
पति ने पत्नी पर लगाया गंभीर आरोप
गेवेंद्र साहू और मीना का विवाह 18 फरवरी 2022 को हुआ था। दोनों का एक बेटा यक्ष है, जिसकी उम्र करीब दो वर्ष है। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144(1) के तहत भरण-पोषण की मांग की थी।
पति ने पत्नी के आरोपों से इंकार करते हुए दावा किया कि पत्नी का व्यवहार शुरू से ठीक नहीं था और वह अक्सर विवाद करती थी। पति के अनुसार 19 जनवरी 2025 की रात पत्नी ने एक युवक को घर बुलाया था। उसके माता-पिता ने दोनों को कथित रूप से आपत्तिजनक स्थिति में देखा। पति ने दावा किया कि पूछताछ में दोनों ने विवाह से पहले से एक-दूसरे को जानने और संबंध होने की बात बताई। इसके बाद पत्नी 20 जनवरी 2025 को मायके चली गई।
समाज ने किया समझौता, पदाधिकारियों ने सुनाया ये फैसला
पति का एक और दावा था कि 28 मार्च 2025 को साहू समाज के पदाधिकारियों की मौजूदगी में दोनों का पारंपरिक रूप से विवाह विच्छेद कर दिया गया। इसके तहत पत्नी को 21 हजार रुपये दिए गए और नाबालिग बच्चे को मां के साथ रहने का समाज ने फैसला सुनाया।
पति ने इसी आधार पर हाई कोर्ट में तर्क दिया कि पत्नी अब उसके साथ वैवाहिक संबंध में नहीं है और अलग रह रही है। साथ ही उसने पत्नी पर विवाह के दौरान दूसरे पुरुष के साथ संबंध में रहने का आरोप लगाते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144(4) के तहत ऐसी स्थिति में पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
हाई कोर्ट ने कहा- साक्ष्य से होगी आरोपों की पुष्टि
याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने कहा, फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद अंतरिम भरण-पोषण का आदेश दिया है। पत्नी और बच्चा फिलहाल अंतरिम भरण-पोषण की मांग कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि कथित पारंपरिक तलाक, पत्नी का अलग रहना और दूसरे पुरुष के साथ कथित संबंध जैसे मुद्दे साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन की मांग करते हैं। अंतरिम भरण-पोषण के स्तर पर केवल पति द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर इन दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बच्चे के अधिकार को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
हाई कोर्ट ने कहा, नाबालिग बच्चा भरण-पोषण का हकदार है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी को केवल 1000 रुपये और बच्चे को 500 रुपये प्रतिमाह दिए हैं। कोर्ट ने इस राशि को न्यूनतम और उचित माना तथा कहा, यह पति पर ऐसा आर्थिक बोझ नहीं है जिसे अनुचित या अत्यधिक कहा जाए।
पति की कम आय और आर्थिक कठिनाई की दलील पर भी हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए राशि तय की है। केवल कम आय का दावा या पत्नी का अलग रहना अपने आप में अंतरिम भरण-पोषण से इंकार करने का आधार नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से किया इनकार
चीफ जस्टिस ने माना कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि, अनियमितता या क्षेत्राधिकार संबंधी गलती नहीं है। इसलिए हाई कोर्ट के हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया है। बेमेतरा फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत पत्नी और नाबालिग बेटे को 1500 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश प्रभावी रहेगा।



