CG क्या सांदीपनि पब्लिक स्कूल पेण्ड्री मस्तूरी में भी एक्टिव हैँ बुक माफिया बालाजी में छोटे बच्चों का भी बुक 4 से 5 हजार के बीच RTE वाले विद्यार्थी भी चपेट में जानें पूरा मामला पढ़े पूरी ख़बर
मस्तूरी//बिलासपुर जिले के मस्तूरी पेण्ड्री स्थित सांदीपनी प्राइवेट स्कूल में स्कूल प्रबंधन और बालाजी बुक डिपो मस्तूरी दोनों की मिलीभगद से चलाया जा रहा यहाँ पढ़ने वाले बच्चों के पेरेंट्स कों लूटने का खेल इनकों आप बुक माफिया कहें तो गलत नहीं होगा यहाँ पांचवी जैसी छोटी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के कुल बुक की कीमत 4000 से 4500 के बीच आ रहा हैँ दों बुक ऐसी हैँ जिसका मूल्य 835 और 835 रुपए हैँ आपको जान कर हैरानी होंगी कि स्कूल प्रबंधन नें पांचवी क्लास के लिए पुस्तकों की लिस्ट जारी किया है जिसमे 10 पुस्तक पालकों कों बच्चों के लिए खरीदना हैँ उसमे 8 बुक की कीमत 2142 रुपए हैँ और दों बुक हीं 1670 का मिल रहा हैँ,सांदीपनि स्कूल प्रबंधन द्वारा जारी लिस्ट में 8 बूकों का रेट तो स्पष्ट लिखा गया हैँ किन्तु बचें हुए जो दों और सबसे महंगे किताबें हैँ जिसमे एक का 850 तो दूसरे का भी 850 रुपए मूल्य हैँ इनका रेट जारी लिस्ट में लिखा हीं नहीं गया हैँ और इसी लिए हम सांदीपनि और इनके सहयोगी बालाजी बुक डिपो मस्तूरी दोनों कों बुक माफिया कह रहें हैँ।
आज के समय में प्रत्येक पेरेंट्स बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं ताकि बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सके और इसी बात का फायदा सांदीपनी स्कूल प्रबंधन और बालाजी बुक डिपो मस्तूरी दोनों मिलकर उठा रहे आपको बताते चलें की मस्तूरी पिछड़ा हुआ क्षेत्र है यहां अधिकांश परिवार रोजगार के अभाव में पलायन को मजबूर हो जाता है क्षेत्र में गांव का गाँव पूरा खाली हो जाता है कोई इट भठ्ठे में काम कर रहा है तो कोई कपडा मिल में कोई आयरन फैक्ट्री में तो कोई पत्थर खदान में कोई कस्ट्रक्शन साइड में तो कोई चौकीदारी कर जीवन यापन कर रहें हैँ,पर यह सभी पेरेंट्स बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए मेहनत से कमाई हुई पैसों को इन बुक माफियाओं को मजबूरी में दे रहे हैं और उनके पास कोई रास्ता भी नहीं है क्योंकि मस्तूरी क्षेत्र में भोले भाले सीधे-साधे लोग रहते हैं इस बात का फायदा स्कूल प्रबंधन जमकर उठा रहा है।
मस्तूरी में बैठे शिक्षा विभाग के अधिकारी खामोश..
हैरानी की बात तो ये हैँ की बुक माफिया और सांदीपनि प्रबंधन मिलकर लूट मचा रहें हैँ और शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारी मौन धारण किए हुए हैँ जिनकी जिम्मे पूरा मस्तूरी शिक्षा विभाग हैँ वही अगर मुक दर्शक बन जाए तो भला मस्तूरी क्षेत्र के गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा की ब्यवस्था कों कैसे सुधारा जा सकता हैँ और कैसे बच्चों का उज्वल भविष्य तय होगा और सबसे बड़ा सवाल इन अधिकारियों कों यहाँ किस काम के लिए बैठाया गया हैँ? जिनके आँखों के सामने यह सब हो रहा हैँ और ये हाथ में हाथ धरे कुर्सी तोड़ रहें हैँ।
सांदीपनि प्रबंधन की लापरवाही तो देखिए यहाँ RTE में पढ़ने वाले बच्चों से भी बुक का पूरा पैसा वसूला जा रहा हैँ अगर गरीब परिवार जो गरीबी रेखा से निचे जीवन यापन कर रहें हैँ उनको आप हर साल भारी भरक बुक का पेमेंट करवा रहें हैँ उनकी इतनी हीं आमदनी होती तो वो अपने बच्चों कों पेमेंट शीट में किसी बड़े स्कूल में नहीं पढ़ा लेते सरकार कों उनका खर्च क्यों उठाना पड़ता।
यहाँ ड्रेस बुक और जूते भी स्पेशल चिन्हित दुकानो में उपलब्ध..
आप कों जान कर हैरानी होंगी की सांदीपनि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पेरेंट्स जब बुक ड्रेस और शु खरीदने जाते हैँ तो यहाँ भी विद्यार्थीयों का नाम पूछा जाता हैँ फिर उनका बिल बनाया जाता हैँ और स्कूल प्रबंधन चुनें हुए दुकानों में यह सामान विक्रय करती हैँ स्कूल से हीं बताया जाता हैँ उनके विद्यार्थियों का ड्रेस बुक और जूते कहाँ और किस दुकान में मिलेंगे इसमें भी आपको सामान्य से ज्यादा रेट में यह सभी सामान मिलेंगे।
कौन होता हैँ बुक माफिया..
अगर देखा जाए तो स्थित शब्द “बुक माफिया” दो अलग‑अलग चीजों के लिए इस्तेमाल हो रहा है: एक तो भारत में किताबों और स्टेशनरी के आसपास भ्रष्टाचार या “माफिया गैंग” वाला अर्थ, और दूसरा एक निजी बुक‑फेयर शिक्षा और “किताब माफिया” का अर्थ मीडिया और शिक्षा‑विवादों में “बुक माफिया” से मतलब स्कूल‑प्रिंटर‑विक्रेता नेटवर्क से जुड़े लोगों से होता है जो MRP बढ़ाकर, बंद लिस्ट बनाकर या एक ही पब्लिशर/डीलर को एक्सक्लूसिव देकर अभिभावकों से ज्यादा पैसा वसूलते हैं। ऐसे मामलों में आरोप यह लगते हैं कि किताबों पर 70–80% तक मार्जिन बनता है, और करोड़ों रुपये का “कमीशन‑खेल” चलता है, जिसमें कई बार स्कूल‑अधिकारी भी शामिल होने की बात सामने आती है।




