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CG सिहावा का अनोखा दशहरा! रावण नहीं, सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का होता है वध, एकादशी पर उमड़ता है हजारों लोगों का हुजूम उमड पड़ता है..!

सिहावा में विजयादशमी के बजाय एकादशी को मनाया जाता है दशहरा, प्रतिमा की पवित्र मिट्टी का तिलक लगाकर लोग मनाते हैं बुराई पर अच्छाई की जीत

धमतरी/सिहावा। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का सिहावा गांव अपनी अनूठी दशहरा परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां देश के अन्य हिस्सों की तरह रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि एकादशी के दिन सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का पारंपरिक विधि-विधान से वध किया जाता है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए हर साल दूर-दराज से बड़ी संख्या में लोग सिहावा पहुंचते हैं।

समय के साथ आधुनिकता का प्रभाव भले ही बढ़ा हो, लेकिन सिहावा गांव ने अपनी इस विशिष्ट धार्मिक परंपरा को आज भी सहेजकर रखा है। यहां दशहरा विजयादशमी के बजाय एकादशी को धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान गांव में मेले जैसा माहौल रहता है और सुबह से ही लोगों की भीड़ जुटने लगती है।

सहस्त्रबाहु की प्रतिमा का वध, मिट्टी के तिलक से मनाते हैं जीत का उत्सव

सिहावा दशहरे की सबसे खास परंपरा सहस्त्रबाहु की प्रतिमा का वध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में वासना से ग्रसित असुर का माता चंडिका ने अपने खड्ग से वध किया था। इसी मान्यता से जुड़ी परंपरा आज भी यहां निभाई जाती है।

एकादशी के दिन विधि-विधान से तैयार प्रतिमा की पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के पुजारी खड्ग से प्रतिमा का वध करते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं में प्रतिमा की मिट्टी अपने घर ले जाने की होड़ लग जाती है। लोग इस मिट्टी को पवित्र मानते हुए माथे पर तिलक लगाते हैं और एक-दूसरे को तिलक लगाकर विजय का उत्सव मनाते हैं।

सुबह से शुरू होती है तैयारियां, गांव का कुम्हार बनाता है प्रतिमा

इस पारंपरिक दशहरा उत्सव की तैयारियां सुबह से ही शुरू हो जाती हैं। प्रतिमा निर्माण के लिए गांव के घरों से मिट्टी एकत्र की जाती है। गांव का कुम्हार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा के अनुसार प्रतिमा तैयार करता आ रहा है। इस आयोजन में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग मिलकर सहयोग करते हैं, जो गांव की सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है।

उत्सव के दौरान गांव के बाहर शीतला माता की पूजा और चांदमारी की परंपरा भी निभाई जाती है। इसके बाद पूजा-अर्चना का सिलसिला चलता है। शाम ढलने के बाद धार्मिक अनुष्ठानों के साथ दशहरा उत्सव अपने विशेष स्वरूप में आगे बढ़ता है।

 महिलाओं की भागीदारी नहीं, परंपरा का स्वरूप आज भी अलग

सिहावा के दशहरे की एक और विशेषता यह है कि पारंपरिक आयोजन में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती। अन्य स्थानों पर जहां रावण दहन के बाद सोनपत्ती बांटकर विजयादशमी की शुभकामनाएं दी जाती हैं, वहीं सिहावा में प्रतिमा की मिट्टी से तिलक लगाकर जीत की खुशी मनाई जाती है।

यह आयोजन सिहावा की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर साल दूर-दराज से आने वाले लोग इस अनूठी परंपरा को देखने और समझने के लिए उत्सुक रहते हैं।

समिति के पदाधिकारियों सहित ग्रामीणों की रही सहभागिता

दशहरा आयोजन के दौरान समिति के अध्यक्ष नरेंद्र नाग, संरक्षक नेम सिंह बिशेन एवं मंशा गौर, उपाध्यक्ष बलदेव निषाद और रामलाल नेताम, सचिव नारद निषाद, कोषाध्यक्ष गेंद लाल यादव, सहसचिव बुधेश्वर साहू एवं लालेस्वर साहू, सलाहकार भरत निर्मलकर, ग्राम पटेल राजेश यदु, सांस्कृतिक प्रभारी तुकाराम साहू, सहप्रभारी महेंद्र कौशल, निर्माण समिति प्रभारी सचिन भंसाली तथा पुजारी ज्ञान सागर पटेल एवं परमेश्वर नेताम सहित अनेक ग्रामीण उपस्थित रहे।

इसके अलावा मेहतर गौर, राजकुमार निषाद, दीपक तंवर, छबि ठाकुर, संजय सारथी, प्रवीण गुप्ता, कुँवर साहू, जग्गू साहू, नरेश पटेल, महेश साहू, संतोष पवार, सुभाष यादव, महेंद्र साहू और अभय नेताम सहित अन्य लोगों ने आयोजन में सहभागिता निभाई।

सप्तऋषियों की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध सिहावा की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। अनूठे धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक सहभागिता के कारण सिहावा का दशहरा आज भी क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।

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