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बहुत से लोगों ने भारत से धर्म को उखाड़ने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे – बाबा उमाकान्त महाराज

On: March 25, 2025 6:27 PM
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बहुत से लोगों ने भारत से धर्म को उखाड़ने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे – बाबा उमाकान्त महाराज

दुनिया की जिन चीजों में इंसान सुख और शांति ढूंढ रहा है सुख तो उन चीजों से परे की चीज है

उज्जैन। परम सन्त बाबा उमाकान्त महाराज ने बताया कि यह भारत देश धर्म परायण देश कहा जाता है। बहुत से लोगों ने यहां से धर्म को उखाड़ने की कोशिश की लेकिन नाकाम क्यों रहे? क्योंकि इसी धरती पर ऋषि, मुनि, योगी, योगेश्वर और सन्तों का प्रादुर्भाव हुआ। जो भी आए उन्होंने अपने-अपने मत को दुनिया में फैलाया, और तब जिन लोगों ने समझने की कोशिश की उनको धर्म समझ में आया। मानवता क्या होती है? प्रेम क्या होता है? सदाचार क्या होता है? विश्व में बहुत से लोग हैं जो इसको आज तक नहीं समझ पाए, लेकिन भारत देश के लोग बहुत कुछ इस चीज को समझे और लोगों को देश-विदेश में उपदेशक बन के, जाकर के समझाए। तो सन्त जब जीवों पर दया करने के लिए इस धरती पर भेजे गए, तो तरह-तरह से उन्होंने लोगों को किस्सा, कहानी, दृष्टांत सुना करके समझाया।

जो आत्महत्या करते हैं, उनको यह नहीं मालूम कि आत्महत्या करने वालों की क्या गति होती है ?

ऐसी सोच लोगों की बनती चली जा रही है कि खाने में सुख है, पहनने में सुख है, अच्छे घर में रहने में सुख है, धन संपत्ति इकट्ठा करने में सुख है, इंद्रियों के भोग में सुख है, लेकिन उसमें सुख नहीं मिलता है। और जब उसमें भी सुख नहीं मिलता है, तो देखो बहुत से लोग जो नहीं करना चाहिए उसको भी कर डालते हैं। बहुत बड़ा जघन्य पाप कर डालते हैं – मनुष्य को मार डालते हैं, जानवरों को मार करके और इस मानव मंदिर को परमात्मा ने पूजा-उपासना-इबादत के लिए दिया है, इसको गंदा करके और बुद्धि खराब कर लेते हैं। जब मारने-काटने पर भी वह सुख नहीं मिलता है, जिसके लिए मारा-काटा था तो खुद भी आत्महत्या कर लेते हैं। आत्महत्या और जीवहत्या यह दोनों बहुत बड़ा पाप है। जो आत्महत्या करते हैं, उनको यही नहीं मालूम है कि आत्महत्या करने वालों की क्या गति होती है? क्या हाल होता है? सजा यहीं से शुरू हो जाती है जब वह छटपटा के मरता है। कोई फांसी लगा के मरा, तो छटपटाता है थोड़ी देर के लिए, कोई ट्रेन के नीचे आ जाता है, कोई जहर खाकर आत्महत्या करता है। उस समय तकलीफ बहुत होती है और जब तकलीफ होती है, तो इच्छा भी उसकी होती है कि हमको कोई बचा ले, लेकिन कोई बचा नहीं सकता है। उसके बाद जब ये शरीर छूट जाता है, तो आत्मा तो दुख भोगती ही भोगती है, उसको तो प्रेत योनि में जाना ही पड़ता है। चिल्लाते हैं, रोते हैं, तड़पते हैं, भूख, प्यास नहीं मिटती है और अगर कोई जानकार मिल गया, मारपीट कर के भगाने लग गया, तो और भी तकलीफ होती है। इसलिए आत्महत्या तथा और जीवों की हत्या तो कभी करना ही नहीं चाहिए।

जब अपने देश, अपने पिता के पास पहुंचोगे तभी शांति मिलने वाली है

महात्मा जब आए, तो उन्होंने कहा कि भाई इसमें सुख नहीं है, सुख इससे परे की चीज है। जब तुम्हें इन चीजों में संतोष होगा, जब इन चीजों को छोड़ोगे, तब तुमको सुख मिलेगा; शांति मिलेगी। जब छोटे-छोटे सुखों को छोड़ोगे, तब बड़ा सुख मिल जाएगा। जैसे किसी से कह दिया जाए कि वह देखो बढ़िया मकान बना हुआ है, तुम यहां झोपड़ी में रहते हो, चलो तुम्हें जगह देते हैं वहां रहने के लिए। और वह अगर कहे कि हमारा यह मकान अच्छा है, हम तो इसको छोड़ेंगे नहीं, तो वह वहां का सुख कैसे भोग पाएगा? ऐसे ही सन्तों ने समझाया कि जहां आप रहते हो, ये पराया देश है, यहां सुख है ही नहीं। जब अपने देश, अपने घर, अपने मालिक, अपने पिता, अपने परमेश्वर के पास पहुंचोगे तभी शांति मिलने वाली है।

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