बिहार

धार्मिक पुस्तकों को सन्त महात्माओं ने बनाया और जब उतनी ही योग्यता का कोई मिलता है वही उनको समझा सकता है – बाबा उमाकान्त महाराज

धार्मिक पुस्तकों को सन्त महात्माओं ने बनाया और जब उतनी ही योग्यता का कोई मिलता है वही उनको समझा सकता है – बाबा उमाकान्त महाराज

यदि अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का असली मतलब पता चल जाए, तो जीवन सार्थक हो जाए

बिहार। नवगछिया, भागलपुर, बिहार परम सन्त बाबा उमाकान्त महाराज ने कहा कि पैदा होते समय बच्चा मुट्ठी बांधकर के पैदा होता है और जाता है तो हाथ पसार कर के जाता है। अब जो लोग इस बात को समझ जाते हैं कि मुट्ठी में बच्चा क्या लेकर के आता है उनकी जिंदगी तो सार्थक हो जाती है और वह जब जाते हैं तो सब कुछ लेकर के जाते हैं। वह दुनिया की चीजें तो छोड़ कर के जाते हैं यहां लेकिन जहां जाना होता है, वहाँ पूरा सामान उनके लिए मोहिया (उपलब्ध) होता है। अब बच्चा क्या ले कर के आता है यह भी बताना जरूरी होता है, नहीं अगर बताया गया तो बात अधूरी रह जाएगी। जैसे यह तो लोग बताते हैं कि अच्छा करोगे तो स्वर्ग जाओगे और बुरा करोगे तो नरक जाओगे। लेकिन अगर किसी से बुरा बन ही गया, जान – अनजान में कोई गलती हो ही गयी, तो अब नरक से बचेंगे कैसे? वह भी बताना जरूरी होता है। तो यह जितनी भी धार्मिक पुस्तकें हैं, ग्रंथ हैं, इनको किसने बनाया? इनको सन्तों ने, महात्माओं ने बनाया। उनके मुख से जो बात निकली और उनके प्रेमियों ने लिख दिया, वही ग्रंथ हो गया। अब उतनी ही योग्यता का जब कोई मिलता है और उसको समझता है, तब वह समझ आता है। जैसे सोलह दर्जा पढ़ कर के अगर कोई किताब लिखे, तो सोलह दर्जा पढ़ कर के कोई दूसरा आएगा, तभी उसको समझा पाएगा। और अगर कम पढ़ा लिखा समझाने लगता है तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। ऐसे ही, जब जानकार कोई मिलता है तब तो इसका अर्थ समझा देता है और नहीं तो लोग कुछ और ही मतलब निकाल लेते हैं।

लोग अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का क्या अर्थ लगा देते हैं ?

लोग अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का क्या अर्थ लगा देते हैं? अर्थ का मतलब लगाते हैं रूपेया, पैसा। कहते हैं पैसा खूब कमाओ, मुठ्ठी में खूब पैसा भर-भर के लाओ। हाथ से पैसा कमाओ, चाहे मार के कमाओ, चाहे काट के कमाओ, चाहे चोरी कर के कमाओ, चाहे खेत काट के कमाओ, बस पैसा कमाओ। धर्म का क्या मतलब लगाते हैं? धर्म में देखो आप कई धर्म हो गए। कितने ही मत – मतांतर हो गए। अपने – अपने मन से लोग धर्म बना लेते हैं। जैसे चोरों ने कहा मेहनत कर के खाना ये बड़ा धर्म है, तो पहले मेहनत करूंगा, मारूंगा और फिर छीनूंगा, लूटूंगा। काम का क्या मतलब लगाते हैं? कहते हैं काम का मतलब खूब बच्चे पैदा करो। उनका यही सिद्धांत बन गया “काम”। और मोक्ष के लिए कहते हैं कि बस यही मोक्ष है कि गृहस्थ धर्म का पालन कर ले जाओ, बच्चों को कैसे भी खिला – पीला कर के और बस इसी में मोक्ष हो जाएगा। कहते हैं बस गंगा जमुना में स्नान कर लो, बस उसी में मुक्ति मोक्ष हो जाएगा।

अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का वास्तविक मतलब

अर्थ का मतलब होता है कि इस मनुष्य शरीर को पाने का अर्थ समझो कि यह मनुष्य शरीर किस लिए दिया गया। खाने – पीने, मौज – मस्ती के लिए दिया गया या किसी विशेष काम के लिए दिया गया। देवता इस मनुष्य शरीर के लिए क्यों तरसते हैं? कहा गया “नर समान नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥”। इसमें कौनसी ऐसी विशेषता है कि जिससे देवता उसको मांगते रहते हैं? तो इसका अर्थ लगाओ, समझो। धर्म क्या है? इस शरीर को चलाने वाली जो जीवात्मा है, उसको अपने घर पहुंचाना, उसको, उस मालिक तक पहुंचाना, जिसकी ये अंश है। कहा गया “ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि”। ये चेतन जीवात्मा उस परमात्मा की अंश है। यही चेतन है, यही शरीर को चलाती है। तो इस जीवात्मा को वहां तक पहुंचाना, यह है धर्म। काम का मतलब क्या होता है? काम का मतलब होता है – असला काम। इस शरीर का यह असला काम है (शरीर के रहते – रहते जीवात्मा को प्रभु तक पहुंचाना)। मोक्ष का मतलब होता है कि फिर नीचे ना उतरना (पराए देश)। अपने घर, अपने वतन, अपने मालिक के पास पहुंच जाना। और जब यह उसमें विलीन हो जाती है तो फिर इधर वापस नहीं आना होता है। गोस्वामी जी महाराज ने कहा ना “यह तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥” अगर विषय वासनाओं में ही इसको लगाए रहे, खाने पीने में ही लगाए रहे, यही अगर असला धर्म समझ लिया तो आखिरी वक्त में बड़ी तकलीफ होती है।

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