महिला दिवस विशेष : हौसलों की नई मीनार डा. शिखा गोस्वामी – सुधीर श्रीवास्तव

महिला दिवस विशेष : हौसलों की नई मीनार डा. शिखा गोस्वामी – सुधीर श्रीवास्तव
नया भारत डेस्क। मानव विकास की चाहे जितनी उपलब्धियां हासिल कर ले, पर ईश्वर की व्यवस्था के आगे वो हमेशा ही बौना था,है और रहेगा। तभी तो कहा जाता है कि हम भले ही अपने दृष्टिकोण, सुख-सुविधाएं लाभ-हानि के नजरिए से भले ही उसे दोषी मानते हों, पर ईश्वर की हर व्यवस्था, निर्णय हमारे आपके, हर प्राणी के लिए सबसे बेहतर ही होता है, बस नजरिया बदलने की जरूरत है। इसके उदाहरणों से हम अनभिज्ञ भी नहीं हैं।

कुछ ऐसा ही उन सभी के साथ भी है, जिन्हें ईश्वर किसी सुविधा से वंचित रखता है, लेकिन दुश्वारियों, विसंगतियों से जूझने के साथ कुछ विशेष गुण, ज्ञान, योग्यता, क्षमता भी देता है, जिसे अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक माना जाता है।
ऐसा ही एक उदाहरण है, मुंगेली (छत्तीसगढ़) की युवा कवयित्री डा. शिखा गोस्वामी ‘निहारिका’। 14 नवंबर 1995 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में जन्मीं कमल गिरी और श्रीमती रेखा गोस्वामी की संतान हैं उनके दादा महंत शिवशरण गिरी गोस्वामी और दादी श्रीमती प्रीति देवी गोस्वामी हैं। अपने परिवार में सबसे बड़ी हैं। जिनका मूल निवास मारोगढ़, बेमेतरा (छत्तीसगढ़) है, जबकि वर्तमान में वे ग्राम चंद्रखुरी, जिला मुंगेली (छत्तीसगढ़) में निवास कर रही हैं। जिसने शारीरिक विसंगतियों को अपने हौसले से आइना बना दिया और निरंतरता के साथ बिना किस्मत का दोष दिए अपनी साहित्य साधना में रमी हुई हैं। लगातार इलाज के दौर में गुजरे हुए जीवन की ऊहापोह में अपने जूनून से खुद की जीवंतता से अपने होने का बोध कराती रहती हैं।
शिखा पिछले सात वर्षों से साहित्य जगत में बतौर कवयित्री, साहित्यकार और लेखिका होने के साथ-साथ रिपोर्टर व समीक्षक सक्रिय हैं। सामाजिक बाल एवं महिला विकास संस्था मकस झारखंड से सूचना प्रभारी के पद पर कार्यरत हैं तथा यूथ फेडरेशन छत्तीसगढ़ की राज्य संयोजक है। विभिन्न विधाओं जैसे कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, छंद, आत्मकथा, और रस पर उत्कृष्ट रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। शिखा के अब तक 5 एकल पुस्तकें – कुछ भीगे अल्फाजों में (कविता संग्रह), वजह मिल गई (लघु कथा संग्रह), निहारिका की प्रेरक कथाएँ (कहानी संग्रह), आकांक्षी (उपन्यास), Aspirant (उपन्यास) और 4 साझा संकलन मेहंदी हाथों की, निर्भया सांझ, उपवन, गिरिराज नंदनी गिरिजा प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा 50 से अधिक साझा संकलनों और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके अलावा मुख्य रुप से वैदिक प्रकाशन की पुस्तकों में ये सक्रिय लेखिका में से एक है।
सम्मान और उपलब्धियों की बात करें, तो शिखा को साहित्य और मंच संचालन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं।वक्ता मंच सम्मान, रायपुर, सावित्री बाई फुले अवार्ड, सरगांव, वीर जवान अवार्ड, उदयपुर, प्रांति इंडिया अवार्ड, बिहार, यूथ फेडरेशन सम्मान, राजस्थान, फिल्म फेस्टिवल अवार्ड, कोंच, INTERATIONAL ICON AWARD (2024) – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य और समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
WOMEN’S ICON AWARD (2025) –महिला सशक्तिकरण और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिष्ठित सम्मान मिला। साहित्यिक योगदान के लिए काशी हिंदी विद्यापीठ बनारस द्वारा विद्या वाचस्पति मानद डॉक्टरेट उपाधि से नवाजा गया है।
प्रेरणा और पहचान युवा झंडाबरदार बन रही डा. शिखा गोस्वामी ‘निहारिका’ को बचपन से पढ़ने-लिखने का शौक था। इस रुचि ने उन्हें साहित्य सृजन की ओर प्रेरित किया और समय के साथ उनकी लेखनी को खूब सराहना मिली। आज वे साहित्य जगत में एक स्थापित नाम बन चुकी हैं और कई लोग उन्हें अपनी प्रेरणा मानते हैं। वे विभिन्न साहित्यिक मंचों की सम्माननीय सदस्य भी हैं।
डा. शिखा गोस्वामी “निहारिका” का जीवन संघर्ष, दृढ़ निश्चय और साहित्यिक सेवा का प्रतीक है। वे निरंतर अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को प्रेरित करने के साथ साहित्य जगत में अपनी पहचान को और मजबूत कर रही हैं।
विगत पांच वर्षों से पक्षाघात का दंश झेलते हुए यमराज मित्र की पहचान बना चुके गोण्डा (उत्तर प्रदेश) के वरिष्ठ साहित्यकार सुधीर श्रीवास्तव (अपने से उम्र में बहुत छोटी शिखा को न सिर्फ बहन, बेटी मानते हैं, बल्कि प्यार से लाडो बुलाते हैं, उससे प्रेरणा/संबल भी लेना स्वीकार करते हैं साथ ही भावनात्मक रूप लगातार उसकी ताकत बन अभिभावक की भूमिका भी निभाने की कोशिश करते हैं) के अनुसार अमूमन इंसान अपनी विभिन्न कमजोरियों का रोना रोता रहता है, ऐसे में जब एक युवा तरुणी अपने जीवन के तमाम झंझावतों का डटकर सामना करने के साथ ही अपनी साहित्यिक सृजन क्षमता से न केवल अपने को ताकतवर बनाने और न बिखरने की जिद का उदाहरण बनने की निरंतर कोशिशों से जन मानस के अंतस में अपनी छाप छोड़ने को कटिबद्ध तो दिखती ही है, बल्कि बेचारगी का भाव रखने वालों को आइना भी दिखा रही है।
आज शिखा अपने जीवन की चुनौतियों को ही अपनी प्रतिभा से जोड़ कलम को हथियार बनाकर अपने सपनों को साकार करने का संकल्प ले लिया है। जो उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट और चुंबकीय भी बनाता है। तभी तो अपनी लेखनी को अपना सबसे करीबी माने खुद को साहित्य के प्रति समर्पित कर खुद निश्चिंत करने का भाव अपने में समाहित कर लिया है। जो संकल्प, साधना, इच्छा शक्ति के बिना संभव ही नहीं हो सकता।
आज शिखा की जहाँ अपनी पहचान मजबूत हो रही है, वहीं औरों के लिए प्रेरणा भी प्रस्तुत कर रही हैं। ऐसे जीवंत हौंसले की नई मीनार बन रही ऐसी बहन, बेटी को नमन है, जिसने अपने हौंसले से माता-पिता, परिवार और पुरखों ही नहीं अपने शुभचिंतकों, प्रेरकों, सहयोगियों को भी गौरवान्वित करने का अभियान छेड़े हुए है।

