छत्तीसगढ़

CG – ब्लड बैंक में 85 यूनिट खून के बाद भी डोनर लाने की शर्त, मां गिड़गिड़ाती रही पर ब्लड बैंक ने नहीं दिया एक यूनिट खून, चली गई बेटी की जान…..

दुर्ग। सरकारी अस्पतालों में नियमों की आड़ में संवेदनहीनता का खेल किस कदर इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ सकता है, इसकी एक रूह कंपा देने वाली बानगी भिलाई के जिला अस्पताल में देखने को मिली है। जिला अस्पताल में इलाज के दौरान एक 20 साल की युवती की मौत हो गई। स्वजनों के मुताबिक युवती के शरीर में खून की भारी कमी थी, इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने उसे एक यूनिट ब्लड तक नहीं दिया। समय पर खून न मिलने के कारण उसकी जान चली गई। उस वक्त जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में ‘ओ पॉजिटिव’ ग्रुप का कुल 85 यूनिट रक्त सुरक्षित रखा हुआ था। मगर अस्पताल के ब्लड बैंक कर्मियों ने मानवता को ताक पर रखकर पिता के सामने तुरंत एक्सचेंज डोनर लाने की अनिवार्य शर्त रख दी।

सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित थी युवती

अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, युवती सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित थी और उसका इलाज चल रहा था। उसका ब्लड ग्रुप ओ-पॉजिटिव था और हीमोग्लोबिन घटकर करीब पांच ग्राम रह गया था। डॉक्टरों का यह भी मानना है कि अगर रिश्तेदारों के पास डोनर नहीं था, तो भी अस्पताल के स्टॉक से उसे कम से कम एक या दो यूनिट ब्लड दिया जा सकता था।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक युवती का नाम दीपिका गाड़ा है, जो मरोदा भिलाई की रहने वाली थी। दीपिका कई दिनों से बीमार थी। उसके हाथ-पैर, कमर और पूरे शरीर में दर्द की शिकायत थी। तबीयत बिगड़ने पर शनिवार रात करीब 11 बजे उसे एम्बुलेंस से जिला अस्पताल लाया गया।

जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में खून की मात्रा काफी कम है और तुरंत ब्लड चढ़ाने की जरूरत है। परिवार का आरोप है कि अस्पताल की ओर से तीन यूनिट ब्लड की व्यवस्था करने के लिए कहा गया। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वे तुरंत डोनर नहीं जुटा सके। उन्होंने अस्पताल स्टाफ और ब्लड बैंक से कम से कम एक यूनिट ब्लड देने की मांग की, ताकि इलाज शुरू हो सके, लेकिन उन्हें खून नहीं दिया गया।

मां गिड़गिड़ाती रही

इलाज के दौरान दीपिका ने दम तोड़ दिया। रिश्तेदारों ने अस्पताल मैनेजमेंट पर लापरवाही का आरोप लगाया है। दीपिका की मां ने बताया कि डॉक्टरों ने कहा था कि उसकी ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन का लेवल करीब पांच ग्राम था। उन्होंने कई बार अस्पताल स्टाफ से रिक्वेस्ट किया कि कम से कम एक यूनिट खून चढ़ा दिया जाए, बाकी की व्यवस्था वे बाद में कर लेंगे, लेकिन उनकी कोई मदद नहीं की गई।

सिविल सर्जन ने जताई एस्पिरेशन की आशंका
वहीं सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने बताया कि युवती सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित थी और उसका इलाज चल रहा था। उन्होंने बताया कि दीपिका का ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव था और उसका हीमोग्लोबिन स्तर करीब पांच ग्राम था।

सीएस का कहना है कि मौत का कारण केवल खून की कमी होना जरूरी नहीं है। उन्होंने बताया कि आईसीयू के डॉक्टरों ने उन्हें आशंका जताई है कि युवती को एस्पिरेशन की समस्या भी हो सकती है। यानी खाना या कोई अन्य पदार्थ सांस की नली के रास्ते फेफड़ों में पहुंच गया हो, जिससे सांस लेने में गंभीर दिक्कत हुई हो।

युवती की मौत सिकल सेल एनीमिया, एस्पिरेशन या किसी अन्य चिकित्सकीय कारण से भी हो सकती है। कारण का खुलासा पीएम के बाद हो पाएगा। सीएस ने बताया कि मामले की जांच के लिये टीम बनाई गई है l जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

खून चढ़ाने को लेकर क्या कहते हैं नियम?

स्वास्थ्य मंत्रालय के नियम मुताबिक, सिकलिन, थैलेसीमिया और हीमोफिलिया जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को आपातकालीन स्थिति में बिना किसी ‘एक्सचेंज डोनर’ और बिना किसी प्रोसेसिंग शुल्क के तुरंत खून उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके बावजूद ब्लड बैंक कर्मियों ने नियमों का गलत हवाला देकर दीपिका को खून देने से साफ मना कर दिया।

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