सृजन,श्रम और शिल्प के आराध्य भगवान विश्वकर्मा,परंपरा से आधुनिकता तक निर्माण की संस्कृति को दिशा देने वाले देव शिल्पी-मनीष शर्मा

डेस्क : भारतीय संस्कृति में सृजन और निर्माण को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। हाथों की मेहनत, बुद्धि की कुशलता और कल्पना की शक्ति जब एक साथ मिलती है, तब सभ्यता का निर्माण होता है। इसी निर्माण परंपरा के आराध्य देवता हैं भगवान विश्वकर्मा, जिन्हें देव शिल्पी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। विश्वकर्मा जयंती केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि श्रम, हुनर, तकनीक और कर्म के सम्मान का अवसर भी है।
कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए अनेक अद्भुत निर्माण किए। भारतीय लोकमानस में वे वास्तुकला, शिल्पकला, यांत्रिकी और निर्माण-कौशल के प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि आज भी कारखानों, कार्यशालाओं, उद्योगों, निर्माण स्थलों तथा विभिन्न तकनीकी संस्थानों में विश्वकर्मा जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।
-श्रम ही सृजन की पहली सीढ़ी
आज जब दुनिया विज्ञान और तकनीक के नए दौर में प्रवेश कर रही है, तब भगवान विश्वकर्मा की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। आधुनिक मशीनें हों या विशाल औद्योगिक संयंत्र, भवन निर्माण हो या छोटे कारीगर की कार्यशाला—हर जगह किसी न किसी रूप में श्रम और कौशल की भूमिका रहती है।
हमारे समाज में अक्सर किसी बड़े निर्माण का श्रेय उसके परिणाम को दिया जाता है, लेकिन उस परिणाम के पीछे दिन-रात परिश्रम करने वाले हाथों को भूल जाते हैं। विश्वकर्मा जयंती हमें उन्हीं मेहनतकश हाथों के सम्मान का संदेश देती है।
“हुनर के हाथों में तकदीर बदलने का हुनर होता है,
मेहनत से जो रचे संसार, वही सच्चा विश्वकर्मा होता है।”
-कारीगर से इंजीनियर तक—एक ही भावना
समय बदला, तकनीक बदली और निर्माण के तौर-तरीके भी बदले, लेकिन सृजन की मूल भावना आज भी वही है। कभी लकड़ी, पत्थर और धातु से निर्माण करने वाला कारीगर आधुनिक युग में मशीनों और कंप्यूटर आधारित तकनीक के साथ काम कर रहा है। इंजीनियर, वास्तुकार, तकनीशियन, शिल्पकार और कुशल श्रमिक—सभी इस व्यापक निर्माण परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
इस दृष्टि से विश्वकर्मा जयंती हमें यह समझने का अवसर देती है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, यदि उसमें ईमानदारी, कौशल और समर्पण जुड़ा हो।
-नई पीढ़ी के लिए संदेश
आज की युवा पीढ़ी के सामने रोजगार और कौशल विकास बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे समय में विश्वकर्मा जयंती का संदेश केवल पूजा तक सीमित न रहकर कौशल और आत्मनिर्भरता से भी जुड़ना चाहिए। युवाओं को तकनीकी शिक्षा, हस्तकला, आधुनिक मशीनरी, उद्यमिता और व्यावसायिक प्रशिक्षण की ओर प्रेरित करना समय की आवश्यकता है।
भारत की प्रगति केवल बड़े उद्योगों से नहीं, बल्कि उन करोड़ों कुशल हाथों से भी होगी जो अपने हुनर से देश की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।
-सृजन की संस्कृति को मिले सम्मान
विश्वकर्मा जयंती हमें प्रकृति, तकनीक और मानव श्रम के बीच संतुलन का संदेश भी देती है। विकास ऐसा हो जो रोजगार पैदा करे, स्थानीय कारीगरों को सम्मान दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण करे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्वकर्मा जयंती को केवल औजारों और मशीनों की पूजा का दिन न मानें, बल्कि श्रम की प्रतिष्ठा, हुनर का सम्मान और सृजनशील भारत के संकल्प का पर्व बनाएं।
भगवान विश्वकर्मा की आराधना का वास्तविक अर्थ भी शायद यही है—अपने कर्म में उत्कृष्टता लाना, अपने हुनर को सम्मान देना और अपने परिश्रम से समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में योगदान देना।
“ईंटों से इमारत बनती है, मगर सपनों से संसार,
मेहनत जब हुनर से मिलती है, तब होता है नया निर्माण।”



