कवर्धा में 70 सरपंचों का बाल स्वास्थ्य एवं गैर-संचारी रोगों पर संवेदीकरण, गांव-गांव तक जागरूकता पहुंचाने पर जोर

कवर्धा में 70 सरपंचों का बाल स्वास्थ्य एवं गैर-संचारी रोगों पर संवेदीकरण, गांव-गांव तक जागरूकता पहुंचाने पर जोर

सिकल सेल रोग, बाल मधुमेह और जन्मजात हृदय विकार के लक्षणों की दी गई जानकारी; मातृ-शिशु स्वास्थ्य, पूर्ण टीकाकरण एवं संस्थागत प्रसव के बाद 48 घंटे अस्पताल में रुकने के महत्व पर भी हुई चर्चा
कवर्धा, 12 अक्टूबर 2026। जनपद पंचायत कवर्धा में जिले के विभिन्न ग्रामों से आए लगभग 76 सरपंचों का बच्चों में होने वाले गैर-संचारी रोगों तथा मातृ-शिशु स्वास्थ्य विषयों पर संवेदीकरण किया गया। कार्यक्रम का आयोजन यूनिसेफ़ छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. गजेंद्र सिंह के नेतृत्व में किया गया। इसका उद्देश्य पंचायती राज संस्था के सदस्यों व जनप्रतिनिधियों, सरपंचो को बाल स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी देकर ग्राम स्तर पर जागरूकता को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम में बच्चों को प्रभावित करने वाले प्रमुख गैर-संचारी रोगों—सिकल सेल रोग, बाल मधुमेह (टाइप-1 डायबिटीज) और जन्मजात हृदय विकार—के लक्षणों एवं समय पर पहचान के महत्व को विस्तार से समझाया गया।
बच्चों में होने वाले रोगों के प्रमुख लक्षणों की दी गई जानकारी
सिकल सेल रोग के संबंध में बताया गया कि बार-बार बुखार आना, जोड़ों एवं शरीर में दर्द होना, कमजोरी और थकान महसूस होना तथा बच्चे का वजन न बढ़ना जैसे लक्षणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
बाल मधुमेह के चार प्रमुख लक्षणों के बारे में जानकारी दी गई अत्यधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना या बिस्तर गीला करना, बहुत अधिक भूख लगना तथा बच्चे के वजन में कमी आना इन लक्षणों के दिखाई देने पर समय पर चिकित्सकीय जांच एवं उपचार कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
इसी प्रकार, जन्मजात हृदय विकार के संभावित लक्षणों में छोटे बच्चे का ठीक से स्तनपान न कर पाना, वजन न बढ़ना तथा तेजी से सांस लेना आदि शामिल हैं। ऐसे लक्षणों की स्थिति में बिना देरी किए स्वास्थ्य केंद्र पर जांच कराने के लिए प्रेरित किया गया।
मातृ-शिशु स्वास्थ्य एवं नवजात देखभाल पर विशेष जोर
सत्र में मातृ-शिशु स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। बच्चों का पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करने तथा संस्थागत प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा की उचित देखभाल के लिए कम से कम 48 घंटे तक स्वास्थ्य संस्थान में रुकने के महत्व की जानकारी दी गई। सरपंचों से इन संदेशों को अपने-अपने ग्रामों तक पहुंचाने और समुदाय को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया गया।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका को मजबूत करने की पहल
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधि समुदाय और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं। सरपंचों की सक्रिय भागीदारी से बच्चों में गंभीर बीमारियों के लक्षणों की समय पर पहचान, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच तथा मातृ-शिशु स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता को मजबूत किया जा सकता है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. डी.के. तुर्रे, जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्रीमती अनुपमा तिवारी तथा संबंधित बीपीएम एवं बीएमओ का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ।
यह पहल बच्चों के स्वास्थ्य संरक्षण, रोगों की शीघ्र पहचान और समुदाय स्तर पर मातृ-शिशु स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।


