
Chhattisgarh dhamtari भुरसीडोंगरी में रविवार को माता शीतला के प्रांगण में जड़ी-बूटियों के संरक्षण, आयुर्वेदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से जिला स्तरीय एक दिवसीय ऋषि पंचमी टोली सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न ग्रामों से ऋषि पंचमी की टोलियां पारंपरिक वेशभूषा, वाद्य यंत्रों और जंगलों से एकत्र किए गए विभिन्न औषधीय पौधों के साथ शामिल हुईं। देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। टोलियों द्वारा जंगल से लाए गए औषधीय पौधों को देवी-देवताओं को समर्पित किया गया तथा उनके औषधीय महत्व एवं पारंपरिक उपयोग की जानकारी लोगों को दी गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता औषधीय पादप बोर्ड छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष विकास मरकाम ने की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ का वन क्षेत्र केवल प्राकृतिक संपदा का भंडार नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही पारंपरिक चिकित्सा और वनौषधि ज्ञान की अमूल्य धरोहर भी है। जंगलों में अनेक ऐसे औषधीय पौधे पाए जाते हैं, जिनका उपयोग हमारे पूर्वज पीढ़ियों से अलग-अलग रोगों के उपचार में करते आए हैं। उन्होंने कहा कि इस पारंपरिक ज्ञान को केवल बुजुर्गों तक सीमित रखने के बजाय नई पीढ़ी तक पहुंचाना और औषधीय पौधों का संरक्षण करने की आवश्यकता है।
विकास मरकाम ने कहा कि जड़ी-बूटियों का संरक्षण आज बेहद जरूरी है। जंगलों में मिलने वाले कई उपयोगी औषधीय पौधे धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। यदि इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो आने वाली पीढ़ियां इनके नाम, पहचान और उपयोग से भी अनजान हो सकती हैं। ऋषि पंचमी टोलियों द्वारा किया जा रहा कार्य इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके माध्यम से जंगलों में उपलब्ध वनौषधियों की पहचान, उनके पारंपरिक ज्ञान और उपयोग की जानकारी समाज तक पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि जंगल की जड़ी-बूटी केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि हमारे लोकज्ञान, संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है। इसलिए औषधीय पौधों के संरक्षण के साथ उनके सही पहचान और उपयोग की जानकारी को भी सुरक्षित रखना आवश्यक है।
उन्होंने ग्रामीणों से अपील करते हुए कहा कि जंगलों से मिलने वाली औषधीय वनस्पतियों का अंधाधुंध दोहन न किया जाए, बल्कि उनके संरक्षण और पुनरोपण पर भी विशेष ध्यान दिया जाए। ऐसे आयोजनों के माध्यम से ग्रामीण अंचलों में मौजूद पारंपरिक वैद्यकीय ज्ञान को सामने लाने का अवसर मिलता है और समाज के युवा वर्ग को अपनी संस्कृति एवं प्रकृति से जोड़ने का काम होता है।
कार्यक्रम में ऋषि पंचमी परिवार के जिला अध्यक्ष मेघुराम नेताम ने पारंपरिक वनौषधियों के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि ऋषि पंचमी की विभिन्न टोलियां जंगलों से अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां एकत्र करती हैं। इनमें माच, दशमूल, चितावर, केउ कांदा, गुरु कांदा, सतावर, झगरइन सहित अनेक प्रकार की वनौषधियां शामिल हैं। इन औषधियों को पारंपरिक मान्यता के अनुसार पहले देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है और इसके बाद आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग रोगों में पारंपरिक ज्ञान के आधार पर लोगों को उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने कहा कि ऋषि पंचमी परंपरा का उद्देश्य केवल जड़ी-बूटियों को एकत्र करना नहीं, बल्कि उनके गुणों एवं उपयोग की जानकारी को सुरक्षित रखना तथा समाज की सेवा करना भी है।
सम्मेलन में विभिन्न ऋषि पंचमी टोलियों से कम से कम दो औषधीय पौधे जड़ एवं पत्ती सहित लाने तथा उनके गुण और पारंपरिक उपयोग की जानकारी साझा करने का आग्रह किया गया था। टोलियों द्वारा लाए गए औषधीय पौधों का ग्राम भुरसीडोंगरी में संबंधित टोली के नाम से रोपण भी किया गया। इससे आने वाले समय में भुरसीडोंगरी में विभिन्न औषधीय पौधों के संरक्षण एवं संवर्धन का एक महत्वपूर्ण स्थल विकसित होने की उम्मीद है। आयोजकों का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य विलुप्त हो रही जड़ी-बूटियों को खोजकर उनका संरक्षण करना, औषधीय पौधों के प्रति लोगों में जनजागरूकता पैदा करना तथा पारंपरिक ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।
कार्यक्रम में वैदिक संस्कृति और लोकपरंपरा का भी अनूठा संगम देखने को मिला। गुरुओं एवं वैद्यराजों का सम्मान परंपरा के अनुरूप किया गया। ऋषि पंचमी टोलियां अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ कार्यक्रम में पहुंचीं और सेवा गीतो की प्रस्तुति दी। गुरु एवं शिष्यों ने वैदिक संस्कृति एवं परंपरा के अनुरूप धोती-कमीज धारण कर आयोजन में सहभागिता की। देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की प्रस्तुति और औषधीय पौधों के प्रदर्शन से पूरा आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकज्ञान एवं संस्कृति का केंद्र बना रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला पंचायत धमतरी के अध्यक्ष अरुण सार्वा रहे। विशेष अतिथियों में सेवानिवृत्त मेडिकल ऑफिसर डॉ. एस.के. नाग, भाजपा मंडल अध्यक्ष बेलरगांव हुमित लिमजा, जिला उपाध्यक्ष गो.स. जिला-धमतरी साधु नेताम, जनपद पंचायत नगरी सदस्य मौसमी मण्डावी, ऋषि पंचमी परिवार के जिला अध्यक्ष मेघुराम नेताम, उपाध्यक्ष- दयाल राम सचिव- रिखब चंद सोनी सहसचिव- सुरेश कुमार नेताम कोषाध्यक्ष- रामचरण नागवंशी तोरण, भुवन दास, हरि देव पटेल, पवन पटेल
ऋषि पंचमी के गुरु घुरऊ नागेश उपस्थित रहे।
इसी क्रम में ग्राम पंचायत भुरसीडोंगरी के सरपंच लिलम्बर नागवंशी, उपसरपंच महेन्द साहू, पूर्व जिला पंचायत सदस्य धमतरी सत्यवती नेताम, ग्राम पंचायत बेलरगांव की सरपंच रीता नेताम, पूर्व जनपद सदस्य नगरी सुकचंद मरकाम, ग्राम पंचायत नवागांव की सरपंच कमलेश्वरी नेताम, ग्राम पंचायत आमगांव की सरपंच कमिलता ध्रुव, ग्राम पंचायत बरबांधा की सरपंच रूखमणी मरकाम, ग्राम पंचायत घुरावड़ के सरपंच महेश नेताम, ग्राम पंचायत जैतपुरी के सरपंच डोमार सिंह नेताम सहित विभिन्न ग्रामों के जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण उपस्थित रहे।
इसके अलावा भुरसीडोंगरी के पूर्व सरपंच मनीराम साहू, पूर्व सरपंच गणेश नेताम, पूर्व सरपंच रोहणी नेताम, ग्राम पटेल शंकर पटेल, गांयता एवं पुजारी जोहरलाल नागवंशी तथा बेलरगांव के ग्राम पटेल एवं गांयता अमरसिंह पटेल सहित विभिन्न ग्रामों से पहुंचे ऋषि पंचमी टोली के सदस्यों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।
भुरसीडोंगरी में आयोजित इस जिला स्तरीय सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि ग्रामीण अंचलों में आज भी प्रकृति, संस्कृति और पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान जीवित है। जड़ी-बूटियों को देवी-देवताओं को समर्पित करने से लेकर उनके संरक्षण और रोपण तक की पूरी प्रक्रिया में धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण और लोकज्ञान की झलक दिखाई दी। आयोजन के माध्यम से विभिन्न गांवों की ऋषि पंचमी टोलियों को एक मंच पर लाकर उनके पारंपरिक ज्ञान का आदान-प्रदान भी किया गया। आयोजकों ने कहा कि आने वाले समय में इस प्रकार के आयोजनों को और व्यापक रूप देकर अधिक से अधिक गांवों को जोड़ा जाएगा, ताकि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वनौषधि संस्कृति, लोकज्ञान और प्राकृतिक संपदा का संरक्षण किया जा सके तथा इसका लाभ समाज तक पहुंचाया जा सके।