छत्तीसगढ़

CG- सीमा पार की प्रेम कहानी का अनोखा अंजाम — बांग्लादेशी प्रेमिका से शादी कर छत्तीसगढ़ पहुंचा युवक, अब पत्नी-बच्चे के लिए हाईकोर्ट में न्याय की गुहार… कोर्ट ने सुनाया चौंकाने वाला फैसला….

बिलासपुर।1 March 2026| प्रेम कहानी का एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है।छत्तीसगढ़ बिलासपुर का एक युवक बांग्लादेश में रह रहा था, वहां रहने के बाद बांग्लादेशी युवती से प्यार हो गया। दोनों बांग्लादेश से भागकर छत्तीसगढ़ आ गए, मंदिर में शादी कर ली और साथ-साथ रहने लगे। शिकायत के आधार पर पुलिस ने युवक को जेल में बंद कर दिया। युवती प्रेग्नेंट थी,लिहाजा नारी निकेतन में उसे सुरक्षित रखा गया। वहां उसने बच्चे को जन्म दिया। जेल से रिहाई के बाद युवक ने पत्नी व बच्चे उसके हवाले करने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ता युवक ने प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा उसकी पत्नी व बच्चे को नारी निकेतन में अवैधानिक रूप से रखा गया है। वह अपनी पत्नी व बच्चे के साथ रहना चाहते हैं, इसलिए पत्नी व बच्चे को उसकी सुरक्षा में दिया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा, महिला का भारत को कोई गार्जियन नहीं होने व अवैध रूप से रहने के कारण ही बतौर सुरक्षा उनको नारी निकेतन में रखा गया है।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता युवक ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में कहा है, वह छत्तीसगढ़ बिलासपुर के देवरीखुर्द का निवासी है। वह ब्राह्मण है, उसकी पत्नी मुस्लिम है। दोनों की जाति अलग होने के कारण लड़की के घर वाले उसकी दूसरी जगह शादी करने दबाव बना रहे थे। दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं, यही कारण है कि हम दोनों बांग्लादेश से भाग कर बिलासपुर आ गए और काली मंदिर में शादी करने के बाद पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहे थे। वर्ष 2025 में एक शिकायत के बाद उसके खिलाफ पाक्सो एक्ट के तहत अपराध दर्ज कर पुलिस ने जेल भेज दिया था। पत्नी गर्भवती थी, उसे पहले बाल कल्याण समिति में रखा गया। बाद में नारी निकेतन रायपुर में रखा गया, नारी निकेतन में उसने पुत्र का जन्म दिया है।

कानून के हिसाब से डिपोर्टेशन

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, पेश किए गए दस्तावेजों से पता चलता है, महिला और ‘उसके पुत्र’ को नारी निकेतन में रखा गया है। यह सजा के तौर पर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा, देखभाल और भलाई के लिए है। जिसे हिरासत में लिया गया है, वह एक जवान औरत है, जिसका भारत में कोई गार्जियन नहीं था, वह उस समय प्रेग्नेंट थी, और बाद में उसने एक लड़के को जन्म दिया। ऐसे हालात में, किसी वेलफेयर इंस्टीट्यूशन में प्रोटेक्टिव कस्टडी को गैर-कानूनी हिरासत नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा, चूंकि कानूनी डिपोर्टेशन पेंडिग है, इसलिए भारत के संविधान के आर्टिकल 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने का कोई आधार नहीं बनता है। इस टिप्प्णी के साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है।

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