CG – रहस्यमयी अदालत : छत्तीसगढ़ में लगती है एक ऐसी अदालत जहां देवी-देवताओं की होती है पेशी, सुनाई जाती है सजा-ए-मौत, आस्था और न्याय का रूप देखकर दुनिया हैरान…..

डेस्क। केशकाल की वादियों में लगने वाली ‘भंगाराम देवी की अदालत’ दुनिया का इकलौता ऐसा मंच है, जहाँ ग्रामीणों की शिकायत पर देवी-देवताओं को कटघरे में खड़ा किया जाता है। यहाँ आस्था सिर्फ हाथ जोड़ना नहीं, बल्कि अपने आराध्य से जवाबदेही मांगना भी है। जब न्याय की देवी भंगाराम अपना फैसला सुनाती हैं, तो बड़े-बड़े देवों की मान्यता तक छीन ली जाती है। बस्तर की यह रोंगटे खड़े कर देने वाली परंपरा विज्ञान और तर्क से परे उस अटूट विश्वास की कहानी है, जो सदियों से इस आदिवासी अंचल की पहचान बनी हुई है। बस्तर के बुजुर्ग और जानकार बताते हैं कि भंगाराम देवी का न्याय इतना अचूक है कि आज के आधुनिक युग में भी यहाँ की परंपरा वैसी ही बनी हुई है जैसी सैकड़ों साल पहले थी। यह किसी अंधविश्वास से ज्यादा, समाज और प्रकृति के बीच की एक अटूट व्यवस्था है।
न्याय की चौखट पर इंसानों को पेश होते तो आपने हजारों बार देखा होगा, लेकिन बस्तर का यह नजारा पूरी तरह अलग है। केशकाल की बारह मोड़ वाली सर्पीली घाटी के ऊपर स्थित भंगाराम देवी का मंदिर साल में एक बार एक ऐसे ‘हाईकोर्ट’ में तब्दील हो जाता है, जहाँ आरोपित कोई अपराधी नहीं बल्कि खुद ग्राम देवता होते हैं। यहाँ बाकायदा सुनवाई होती है, दलीलें दी जाती हैं और अगर दोष सिद्ध हो जाए, तो देवी-देवताओं को निर्वासन से लेकर ‘सजा-ए-मौत’ तक दी जाती है। बस्तर की यह सदियों पुरानी परंपरा आस्था और लोक-लोकतांत्रिक मूल्यों का एक अनूठा संगम है।
हर साल भादो मास के कृष्ण पक्ष के आखिरी शनिवार को यहाँ ‘भादो जातरा’ का आयोजन होता है। यह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जवाबदेही का दिन है। बस्तर के करीब 55 राजस्व गांवों के ग्रामीण अपने देवी-देवताओं के प्रतीकों लाठ, आंगा, छत्र और डोली को लेकर भंगाराम देवी के दरबार में पहुँचते हैं। इस अदालत की मुख्य न्यायाधीश स्वयं भंगाराम देवी होती हैं। परंपरा इतनी अनूठी है कि मंदिर पहुँचने से पहले इन देव-प्रतीकों की बाकायदा थाने में हाजिरी लगती है, पूजा होती है और फिर पुलिस सुरक्षा के बीच इन्हें ‘अदालत’ तक लाया जाता है।
इस अनूठी अदालत में शिकायतकर्ता खुद ग्रामीण होते हैं। अगर किसी गांव में महामारी फैल जाए, फसल बर्बाद हो जाए या मन्नत पूरी न हो, तो ग्रामीण इसका सीधा दोष अपने ग्राम देवता पर मढ़ देते हैं। भंगाराम देवी के सामने पुजारी और मुखिया देवताओं का पक्ष रखते हैं। अगर जांच में देवता की लापरवाही साबित होती है, तो उन्हें दंडित किया जाता है। सजा के तौर पर देवताओं के प्रतीकों को मंदिर परिसर के बाहर एक ‘गड्ढे’ में फेंक दिया जाता है, जिसे देवताओं की जेल या विसर्जन माना जाता है। कुछ गंभीर मामलों में तो देवताओं की पूजा हमेशा के लिए बंद कर दी जाती है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से ‘सजा-ए-मौत’ कहा जाता है।
‘डॉक्टर खान’ जो बन गए पूजनीय देव
बस्तर की इस परंपरा की सबसे खूबसूरत बात इसकी समावेशी संस्कृति है। यहाँ केवल पौराणिक देवी-देवता ही नहीं, बल्कि ‘डॉक्टर खान’ नामक एक इंसान की भी पूजा की जाती है। वर्षों पहले यहाँ सेवा देने वाले एक निस्वार्थ डॉक्टर खान के निधन के बाद ग्रामीणों ने उनकी सेवा को देखते हुए उन्हें देवतुल्य मान लिया। आज भी जब क्षेत्र में कोई बीमारी फैलती है, तो ग्रामीण सबसे पहले डॉक्टर खान की चौखट पर सिर झुकाते हैं। यह बस्तर की उस तासीर को दिखाता है जहाँ धर्म से ऊपर सेवा और परोपकार को रखा गया है। यह अद्भुत अदालत आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का सबसे सशक्त हिस्सा है।



