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CG- वनांचल के तीन भगवान डॉक्टर, जिन्होंने हजारों जिंदगियों में भरी नई सांस..!

वनांचल के हजारों परिवारों के लिए संजीवनी बने तीन डॉक्टर,डॉ. अरुण नेताम, डॉ. एसके नाग और डॉ. किशोर साहू की निःस्वार्थ सेवा ने बदल दी नगरी-सिहावा की स्वास्थ्य तस्वीर

Chhattisgarh नगरी। राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर नगरी-सिहावा के बीहड़ जंगलों से निकलकर आई हैं सेवा, त्याग और जज्बे की तीन ऐसी कहानियां, जो ‘डॉक्टर को धरती का भगवान’ कहने वाली बात को सच साबित करती हैं। नक्सल दहशत, टूटी-फूटी सड़कें, बिजली-पानी का संकट और संसाधनों का घोर अभाव, इन सबके बीच सिविल अस्पताल नगरी के डॉ. अरुण नेताम, PHC बेलर के डॉ. एस.के. नाग और PHC साँकरा के डॉ. किशोर साहू पिछले 8 से 40 सालों से वनांचल के हजारो परिवारों के लिए ‘संजीवनी’ बने हुए हैं।

सीतानदी-उदंती टाइगर रिजर्व से सटे नगरी-सिहावा के 60 से ज्यादा गांव आज भी सड़क, मोबाइल नेटवर्क और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। बरसात में ये गांव टापू बन जाते हैं। ऐसे में इन तीनों ‘जीवनदाता’ डॉक्टरों ने न सिर्फ हजारों जिंदगियां बचाई हैं, बल्कि शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास भी दोबारा कायम किया है।

1. डॉ. अरुण नेताम 25 साल से एक भी जच्चा को नहीं लौटाया

नगरी सिविल अस्पताल का 50 बेड का मेटरनिटी वार्ड डॉ. अरुण नेताम के भरोसे चलता है। ओडिशा के सीमावर्ती गांवों से लेकर सिहावा के अंतिम छोर तक की गर्भवती महिलाएं ‘नेताम सर हैं न’ कहकर निश्चिंत हो जाती हैं। पिछले 25 साल में 20 हजार से ज्यादा सुरक्षित प्रसव कराए। हर महीने औसतन 80-100 नॉर्मल डिलीवरी और 25-30 हाई-रिस्क सीजेरियन। एक भी ऐसा मामला नहीं जहां डॉक्टर की अनुपलब्धता से जच्चा-बच्चा की मौत हुई हो। सिविल अस्पताल में एकमात्र स्त्री रोग विशेषज्ञ। इसके बाद भी इमरजेंसी में एक्सीडेंट, सर्पदंश, बच्चों की बीमारी सब देखते हैं। रात 1 बजे फोन आते ही 10 मिनट में अस्पताल पहुंच जाते हैं। स्टाफ बताता है, “सर ने कभी मना नहीं किया। त्योहार, रविवार सब बराबर। सुबह 9 से OPD शुरू होती है तो मरीजों की लाइन गेट तक होती है। नसबंदी कैंप, किशोरी स्वास्थ्य जांच, एनीमिया मुक्ति अभियान सब अकेले संभालते हैं। इतनी व्यस्तता के बावजूद हर मरीज से मुस्कुराकर बात करते हैं।

2. डॉ. एस.के. नाग: ऐसे दौर से पदस्थ तब सड़के तक नहीं थी

जब डॉ. एस.के. नाग की पहली पोस्टिंग बेलर में हुई, तो यहां पहुंचने के लिए सड़क नहीं थी। नदी-नाले उफान पर हों तो 4-4 दिन गांव से कट जाते थे। नक्सल मूवमेंट चरम पर था। कई डॉक्टरों ने जॉइन करने से मना कर दिया। लेकिन डॉ. नाग डटे रहे। 80-90 के दशक में बेलर मलेरिया और डायरिया का हॉटस्पॉट था। डॉ. नाग ने घर-घर जाकर दवा बांटी, कुएं में क्लोरीन डलवाई। आज बेलर मलेरिया मुक्त है। 2020 में शासकीय सेवा से रिटायर हुए, लेकिन बेलर छोड़कर नहीं गए। “यहां के लोगो को परिवार मानकर सेवा कार्य मे जुटे हुए है। बेलर के अलावा गट्टासिल्ली, जुगदेही, घोटगांव समेत बस्तर सीमा के 20 गांवों के लोग इन्हीं के भरोसे हैं। सर्पदंश का इंजेक्शन हो या डिलीवरी केस, लोग सबसे पहले ‘नाग डॉक्टर’ को ढूंढते हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित। राज्य सरकार ने ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट’ दिया। लेकिन डॉ. नाग कहते हैं, “सबसे बड़ा अवार्ड तब मिलता है जब कोई मां कहती है – ‘डॉक्टर साहब, आपके कारण मेरा बच्चा जिंदा है’।

3. डॉ. किशोर साहू: 8 साल में PHC को बना दिया ‘एम्स’, जीत चुके 2 राष्ट्रीय अवार्ड

जब डॉ. किशोर साहू ने PHC साँकरा जॉइन किया, तो बिल्डिंग की हालात बहुत अच्छी नहीं थी, बाउंड्री वाल नहीं था,दवाइयां नहीं थीं, मरीज आते नहीं थे। 8 साल में उन्होंने इसे कायाकल्प कर दिया। आज यह PHC सुविधाओं में निजी नर्सिंग होम को टक्कर देता है। पूरे नगरी-सिहावा में मशहूर है कि “बीमारी समझ न आए तो साँकरा चले जाओ, साहू डॉक्टर ठीक कर देंगे।” बुखार से लेकर टीबी, शुगर तक का सटीक और किफायती इलाज। इसी वजह से 40-50 किमी दूर से भी मरीज आते हैं। रोजाना OPD 50+पार। डॉ. साहू के नेतृत्व में PHC साँकरा ने 2023 में ‘कायाकल्प अवार्ड’ और 2025 में ‘NQAS सर्टिफिकेशन’ जीता। यह अवार्ड 90% से ज्यादा स्कोर पर मिलता है। इसके बाद ग्राम पंचायत साँकरा को भी स्वास्थ्य ग्राम का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। सरपंच-सचिव के साथ मिलकर अस्पताल की रंगाई-पुताई कराई। मरीजों के लिए वेटिंग हॉल, RO पानी, साफ टॉयलेट बनवाए। दीवारों पर ‘एनीमिया भगाओ’, ‘संस्थागत प्रसव कराओ’ की पेंटिंग।इनकी कार्यशैली से शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति आम जनता का विश्वास बढ़ा है।

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