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विवाह : सात जन्मों का बंधन या क्षणिक स्वार्थ ? : डॉ. शिखा गोस्वामी”निहारिका”

विवाह : सात जन्मों का बंधन या क्षणिक स्वार्थ ?

नया भारत डेस्क। आज जब हम समाचार पत्र खोलते हैं, टीवी देखते हैं या सोशल मीडिया पर नज़र डालते हैं, तो अनेक ऐसी खबरें सामने आती हैं जो मन को झकझोर देती हैं। कहीं पति ने पत्नी की हत्या करवा दी, कहीं पत्नी ने पति को रास्ते से हटाने की साजिश रच दी। कहीं प्रेम संबंधों के कारण परिवार उजड़ रहे हैं, तो कहीं स्वार्थ और लालच के कारण रिश्तों का खून हो रहा है। ऐसे समाचार केवल किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं होते, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी होते हैं।

भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं माना गया है। यह दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो आत्माओं का पवित्र बंधन है। हमारे शास्त्रों में विवाह को सात जन्मों का साथ कहा गया है। अग्नि के समक्ष लिए गए सात फेरे केवल रस्में नहीं होते, बल्कि वे जीवन भर साथ निभाने, सुख-दुख में एक-दूसरे का सहारा बनने और हर परिस्थिति में विश्वास बनाए रखने की प्रतिज्ञाएँ होती हैं।

लेकिन आज प्रश्न यह है कि क्या हम उन प्रतिज्ञाओं का महत्व समझ रहे हैं ?

जब किसी रिश्ते में मतभेद आते हैं, तो बातचीत और समझदारी की जगह हिंसा, धोखा और अपराध क्यों ले लेते हैं? यदि दो लोग साथ नहीं रह सकते, तो कानून ने अलग होने के अनेक रास्ते दिए हैं। परंतु किसी की जान लेना या उसे मानसिक और शारीरिक कष्ट पहुँचाना कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या यही संस्कार हमारे माता-पिता ने हमें दिए हैं? क्या हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया था कि अपनी खुशी के लिए किसी और की जिंदगी बर्बाद कर दो? क्या प्रेम का अर्थ किसी को चोट पहुँचाना है? क्या स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारियों से भागना है?

नहीं। भारतीय संस्कृति हमें त्याग, करुणा, सहनशीलता और सम्मान का पाठ पढ़ाती है। हमारे यहाँ रिश्तों को निभाने की परंपरा रही है, उन्हें तोड़ने की नहीं। हम वह देश हैं जहाँ माता सीता और भगवान राम के आदर्शों की चर्चा होती है, जहाँ सावित्री के समर्पण और निष्ठा की मिसाल दी जाती है। हमारे संस्कार हमें किसी का जीवन छीनना नहीं, बल्कि किसी के जीवन में प्रकाश बनना सिखाते हैं।

यह भी सत्य है कि हर विवाह सफल नहीं होता। कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि साथ रहना संभव नहीं होता। ऐसे में अलग होना गलत नहीं है। गलत है धोखा देना, विश्वास तोड़ना, मानसिक यातना देना या किसी की हत्या जैसा जघन्य अपराध करना। किसी रिश्ते का अंत हो सकता है, लेकिन इंसानियत का अंत नहीं होना चाहिए।

आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा भी दें। उन्हें यह सिखाएँ कि रिश्ते खिलौने नहीं होते जिन्हें मन भर जाने पर तोड़ दिया जाए। उन्हें यह समझाएँ कि हर निर्णय का प्रभाव अनेक जीवनों पर पड़ता है। प्रेम, विवाह और परिवार केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारियाँ भी हैं।

समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि क्षणिक आकर्षण, लालच या स्वार्थ के लिए किसी का जीवन नष्ट करना न केवल कानून के विरुद्ध है, बल्कि मानवता के विरुद्ध भी है। किसी की हत्या करके कोई सुखी नहीं हो सकता। अपराध का अंत हमेशा पश्चाताप, बदनामी और विनाश में होता है।

आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें जहाँ रिश्तों में विश्वास हो, संवाद हो, सम्मान हो और प्रेम हो। जहाँ मतभेद होने पर बातचीत का रास्ता चुना जाए, अपराध का नहीं। जहाँ विवाह को एक पवित्र जिम्मेदारी माना जाए, न कि सुविधा के अनुसार बदला जाने वाला समझौता।

क्योंकि रिश्ते खून से नहीं, विश्वास से जीवित रहते हैं। और जब विश्वास मर जाता है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा समाज घायल हो जाता है।

“किसी का जीवन छीन लेना वीरता नहीं, बल्कि अपनी मानवता की हार है। रिश्तों को बचाइए, विश्वास को बचाइए, क्योंकि यही हमारी संस्कृति की असली पहचान है।”

डॉ. शिखा गोस्वामी”निहारिका”
छत्तीसगढ़

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