छत्तीसगढ़

जिले के तहसीलों में..लचर राज..दस्तावेज पूरे,फिर भी जाति प्रमाण पत्र पर ब्रेक, सहसपुर लोहारा में अप्रूवल को लेकर गंभीर आरोप,जिले के अधिकांश तहसीलों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में, किसान आम नागरिक गरीब का काम अटका तो कौन जिम्मेदार?रकम और पहुंच’ के कथित खेल की जांच की मांग।

कवर्धा/जिले की तहसीलों में आखिर चल क्या रहा है?दस्तावेज पूरे हैं,ऑनलाइन लिंक सही है,रिकॉर्ड का मिलान भी ठीक है,फिर भी जाति प्रमाण पत्र का अस्थायी अप्रूवल लंबित! दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर ऐसे मामलों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं,जिनमें दस्तावेजों पर आपत्तियां होने के बावजूद कथित रूप से अप्रूवल दिए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

सहसपुर लोहारा तहसील को लेकर सामने आ रहे ये गंभीर आरोप अब केवल एक कार्यालय की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं हैं। जिले की अधिकांश तहसीलों में लगातार सामने आ रही लापरवाही,देरी और आम नागरिकों की शिकायतों ने पूरी राजस्व एवं प्रमाण पत्र व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा दिया है।

स्थानीय लोगों के बीच चर्चा और शिकायतें हैं कि कथित तौर पर अधिकांश मामलों में काम की रफ्तार ..रकम.. और पहुंच देखकर बदल जाती है। आरोप बेहद गंभीर हैं और यदि इनमें जरा भी सच्चाई है तो यह गरीबों के अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक ही तरह के दस्तावेज और एक जैसी पात्रता होने के बावजूद किसी का आवेदन दिनों तक क्यों अटका रहता है और किसी का काम तेजी से कैसे हो जाता है? प्रशासन को इसका जवाब देना होगा।

इस कथित अव्यवस्था का खामियाजा सेवा सेतु केंद्र संचालकों को भी भुगतना पड़ रहा है। आवेदनकर्ता प्रमाण पत्र लंबित होने पर सबसे पहले केंद्र संचालक से जवाब मांगता है,जबकि अंतिम अप्रूवल उसके हाथ में नहीं होता।

स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप सामने आए हैं कि यदि किसी स्तर पर कथित अवैध मांग होती है तो सेवा सेतु केंद्र संचालकों को माध्यम बनाने की कोशिश की जाती है। ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है,क्योंकि इसका सीधा असर उन संचालकों की प्रतिष्ठा पर पड़ रहा है,जो केवल आवेदन प्रक्रिया में हितग्राहियों की सहायता कर रहे हैं।

जाति प्रमाण व अन्य राजस्व संबंधी कार्य गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए महज एक दस्तावेज नहीं है। छात्रवृत्ति,स्कूल-कॉलेज में प्रवेश,सरकारी योजनाओं न्याय और कई आवश्यक कार्यों के लिए इसकी समय सीमा पर होना पर जरूरी है। ऐसे में दस्तावेज पूरे होने के बावजूद आवेदन लंबित रहने से सबसे ज्यादा नुकसान उसी व्यक्ति को होता है,जिसकी न कोई बड़ी पहुंच है और न ही वह बार-बार कार्यालयों के चक्कर काट सकता है, नहीं मोटी रकम दे सकता है।

सरकार ने ऑनलाइन व्यवस्था इसलिए बनाई है कि आम आदमी को सुविधा मिले,लेकिन यदि ऑनलाइन आवेदन के बाद भी फाइलें कथित तौर पर दफ्तरों की मर्जी से आगे बढ़ें,तो फिर डिजिटल व्यवस्था का फायदा किसे?

अब जरूरत केवल आश्वासन की नहीं,बल्कि जवाबदेही की है।जिला प्रशासन को सहसपुर लोहारा सहित जिले की अन्य तहसीलों में लंबित जाति प्रमाण पत्र आवेदनों की समीक्षा करनी चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने आवेदन लंबित हैं,किस कारण से लंबित हैं और निर्धारित समय-सीमा में उनका निराकरण क्यों नहीं हुआ।

यदि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही,भेदभाव,अनुचित दबाव या लेन-देन से जुड़ी अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

सवाल व्यवस्था से है….

प्रमाण पत्र व अन्य कार्य नियम और दस्तावेज देखकर बन रहा है या फिर गरीब की मजबूरी और उसकी पहुंच देखकर?

क्योंकि तहसील कार्यालय संबंधित कोई भी कार्य किसी अधिकारी की मेहरबानी नहीं,पात्र नागरिक का अधिकार है। और अधिकार के लिए अगर आम आदमी को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ें,तो सवाल सिर्फ एक तहसील पर नहीं,पूरी व्यवस्था पर उठना तय है।

Related Articles

Back to top button