Bastar Dussehra 2026:मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र जगदलपुर रवाना, परंपरागत विधि-विधान के साथ मावली परघाव की ऐतिहासिक रस्म की तैयारी शुरू..!

बस्तर दंतेवाड़ा। विश्व प्रसिद्ध 75 दिवसीय ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की प्रमुख धार्मिक रस्म मावली परघाव के लिए मां दंतेश्वरी की पावन डोली एवं राजछत्र रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हुए। शारदीय नवरात्र की अष्टमी के अवसर पर आयोजित इस पारंपरिक विदाई समारोह में श्रद्धा, आस्था और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। गाजे-बाजे, मोहरी की गूंज, लोकनृत्य और जयकारों के बीच हजारों श्रद्धालुओं ने मां की डोली को भावभीनी विदाई दी।
पूजा-अर्चना के बाद कलेक्टर ने दिखाई रवाना होने की परंपरागत शुरुआत
टेम्पल कमेटी के अध्यक्ष एवं कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव ने आंवराभाटा स्थित माई जी के चबूतरे पर विधिवत पूजा-अर्चना कर जिले की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की। इसके बाद मां दंतेश्वरी की डोली एवं राजछत्र को जगदलपुर के लिए रवाना किया गया। इस दौरान पुलिस अधीक्षक चंद्रमोहन सिंह, जनप्रतिनिधि, मंदिर समिति के पदाधिकारी, पुजारीगण और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

पुलिस की सलामी, मोहरी की धुन और जयकारों से गूंजा नगर
मां दंतेश्वरी की डोली मंदिर से रवाना होने से पहले पुलिस बल ने मंदिर के मुख्य द्वार पर पहली सलामी देकर सम्मान अर्पित किया। मंदिर समिति के व्यवस्थापकों और पुजारियों ने पारंपरिक पूजा-अनुष्ठान संपन्न कराए। इसके बाद डोली की यात्रा शुरू हुई, जिसमें पारंपरिक वाद्य यंत्रों, मोहरी की मधुर धुनों और लोकनृत्य दलों ने धार्मिक माहौल को और भी भव्य बना दिया।
डोली जय स्तंभ चौक से होते हुए डंकनी नदी पुल तक पहुंची। इस दौरान प्रधान पुजारी जिया बाबा सहित मांझी, चालकी, कुम्हार, राउत, समरथ और सेवादार पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हुए पैदल साथ चले। पूरे मार्ग में श्रद्धालु ‘जय मां दंतेश्वरी’ के जयकारे लगाते रहे।
आंवराभाटा में विशेष पूजा, फूलों से सजे काफिले में आगे बढ़ी डोली
डंकनी नदी पार करने के बाद डोली को आंवराभाटा स्थित माई जी के चबूतरे पर विराम दिया गया। यहां कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव ने अपनी धर्मपत्नी संध्या ध्रुव के साथ विधिवत पूजा-अर्चना कर जिले की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। इसके पश्चात फूलों से सजे वाहनों के विशेष काफिले के साथ मां की डोली एवं राजछत्र आगे की यात्रा पर रवाना हुए।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हारम चौक में पूजा-अर्चना के बाद प्रधान पुजारी डोली को पैदल लेकर गीदम नगर सीमा स्थित फॉरेस्ट नाका तक जाएंगे। इसके बाद कोड़ेनार और तोकापाल के निर्धारित पूजा स्थलों पर डोली को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रोका जाएगा। यात्रा के अंतिम चरण में डोली जगदलपुर स्थित जिया डेरा पहुंचेगी, जहां मावली परघाव की ऐतिहासिक रस्म संपन्न होगी।
बस्तर दशहरा की आत्मा है मावली परघाव
बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं और धार्मिक स्वरूप के कारण देशभर में विशिष्ट पहचान रखता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव भगवान राम की विजय गाथा के बजाय बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की उपासना पर केंद्रित है।
मावली परघाव इस महोत्सव की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है। इस अवसर पर दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की डोली जगदलपुर पहुंचती है और परंपरा के अनुसार मावली माता से मिलन का अनुष्ठान संपन्न होता है। यह आयोजन बस्तर की राजपरंपरा, आदिवासी आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
27 अक्टूबर को दंतेवाड़ा लौटेगी मां की डोली
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचने पर पुलिस बल द्वारा डोली को अंतिम सलामी दी जाएगी। मां की डोली 26 अक्टूबर तक जगदलपुर में विराजमान रहकर बस्तर दशहरा की विभिन्न ऐतिहासिक रस्मों में शामिल होगी। धार्मिक अनुष्ठानों के संपन्न होने के बाद 27 अक्टूबर 2026 को मां दंतेश्वरी की डोली एवं राजछत्र जगदलपुर से दंतेवाड़ा के लिए वापसी यात्रा पर रवाना होंगे।
मां दंतेश्वरी की डोली की यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा, जनआस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने वाला ऐतिहासिक अवसर है।
