छत्तीसगढ़

आत्म-अवलोकन की दहलीज़ पर छत्तीसगढ़ सरकार:सत्ता के शिखर से ज़मीनी हक़ीक़त का आकलन।

(रविनंदन पांडेय)
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार के मौजूदा कार्यकाल का आधा से ज़्यादा सफ़र पूरा हो चुका है। राजनीति में ढाई-तीन साल का समय सिर्फ़ कैलेंडर के पन्ने बदलना नहीं होता, बल्कि यह वह पड़ाव होता है जहां से आगे की राह या तो और सुनहरी होती है या फिर ढलान की ओर मुड़ जाती है। ‘जैसे-तैसे’ करके ही सही, सरकार ने अपनी आधी से अधिक दूरी तय कर ली है, लेकिन अब बचा हुआ सफ़र सरकार और उसके तमाम जनप्रतिनिधियों के लिए आत्ममुग्धता का नहीं, बल्कि गहन आत्मावलोकन का है।
यह समय सत्ता के मद में आकर जाने-अनजाने हुई भूल-चूक को सुधारने, अहंकार के परिमार्जन और ज़मीनी हक़ीक़त से रूबरू होने का है।

कार्यकर्ताओं की ‘निस्वार्थ आहुति’ और आज की हक़ीक़त*
किसी भी राजनीतिक दल की सत्ता का महल उसकी नींव के पत्थरों पर टिका होता है—और वे पत्थर होते हैं पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता। इस सफ़र की शुरुआत में जिन कार्यकर्ताओं ने बिना किसी स्वार्थ के, जिन उम्मीदों और अपेक्षाओं के साथ रात-दिन एक किया, आज शीर्ष पर बैठे जनप्रतिनिधियों को अपने गिरेबां में झांककर देखना होगा कि उन कार्यकर्ताओं के साथ उनका व्यवहार कैसा रहा?
क्या ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद उन कंधों को भुला दिया गया, जिनके दम पर यह पद, प्रतिष्ठा और सम्मान हासिल हुआ था? सत्ता के गलियारों में कार्यकर्ताओं की सहज पहुंच और उनके मान-सम्मान की रक्षा ही अगले सफ़र की कामयाबी तय करेगी।

मतदाता की कसौटी पर कार्य-व्यवहार
लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। छत्तीसगढ़ के जिन मतदाताओं ने अपने अंतर्मन से भाजपा को अपना सच्चा शुभचिंतक मानकर सत्ता की चाबी सौंपी, आज वे खुद को ठगा हुआ महसूस न करें, यह सुनिश्चित करना सरकार की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।
क्या आज प्रदेश का आम नागरिक सरकार के कार्य-व्यवहार और प्रशासनिक व्यवस्था से संतुष्ट है?
क्या जनसमस्याओं के निपटारे में वही तेज़ी और संवेदनशीलता दिख रही है, जिसका वादा चुनाव के दौरान किया गया था?
अगर कहीं भी असंतोष की चिंगारी है, तो उसे समय रहते बुझाना होगा, अन्यथा सत्ता के गलियारों की दूरी और जनता के बीच की खाई को पाटना मुश्किल हो जाता है।
“सफ़र उतार का है…”
शायद इसीलिए आज किसी शायर की ये पंक्तियां छत्तीसगढ़ के सियासी परिदृश्य पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं:
“ये शोर नदी का नहीं आबशार का है; यहां से जो भी सफ़र है वो उतार का है।”
(नोट: आबशार अर्थात झरना, जहां पानी ऊंचाई से नीचे गिरता है।)
यह पंक्तियां आगाह करती हैं कि सत्ता का शीर्ष हमेशा स्थायी नहीं होता। यदि समय रहते अहंकार का त्याग कर गलतियों को नहीं सुधारा गया, तो आने वाला समय स्वागत के बजाय विदाई का रास्ता भी दिखा सकता है।
छत्तीसगढ़ सरकार और उसके सभी ज़िम्मेदार जनप्रतिनिधियों के पास अब भी पर्याप्त समय है। यदि वे आने वाले समय में एक और शानदार तथा कीर्तिमान सफ़र की शुरुआत देखना चाहते हैं, यदि वे चाहते हैं कि भविष्य बांहें पसारकर उनका स्वागत करे, तो उन्हें आज ही से सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।
सत्ता की हनक छोड़, कार्यकर्ताओं को गले लगाना होगा और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को पुनः सिद्ध करना होगा। क्योंकि इतिहास गवाह है, जनता जब अर्श पर बैठा सकती है, तो समय आने पर फ़र्श पर लाने में भी देर नहीं करती। अब फैसला जनप्रतिनिधियों को करना है कि वे इस सफ़र को ‘उतार’ की ओर ले जाना चाहते हैं या ‘उत्कर्ष’ की ओर।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button