डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका” ने लिखा दादा की याद – कविता…

दादा की याद
नया भारत डेस्क।
आज पुण्यतिथि है दादा की,
याद रखूँगी मैं वादा की।
डाँटते थे हरदम वे मुझको,
करती थी जब जन्मदिन फोन सबको।
सबको जन्मदिन तू विश करती है,
“क्या किसी का मरण दिन भी याद रखती है?”
हाँ दादाजी, रखती हूँ याद,
जब इंसान हो बहुत खास।
तो उसकी हर एक बात,
रहती हैं याद।
दादा हरदम रहते थे खुश,
पर थे वे थोड़े कंजूस।
खुद पर खर्च ना करते थे,
खाने में रोज नई फरमाईश वे करते थे।
अंत समय में जाने क्यों,
बच्चों सा हठ वे करते थे।
पर खाने-पीने में वे,
परहेज़ ना करते थे।
बार-बार बुलाते मुझको,
तब गुस्से से मैं जाती थी।
“बेटी-बेटी” कहते तो,
गुस्से को पी जाती थी।
कहते— “बेटी, चाय पिला दे मुझको”
— “नहीं दूँगी,डॉक्टर ने मना किया है आपको।”
— “अरे,डॉक्टर कुछ नहीं जानता है,
चाय पीने से कुछ न होता है।”
उनकी बातें सुनकर ,
मेरा मन पिघल जाता।
चाय बना कर दे आती ,
जी मेरा भर जाता।
एक दिन बोले दादाजी माँ से,
— “बेटी, जरा दही खिला दे, खाने को जी करता है।
नहीं है तो मंगा ले,
बहुत ही मन करता है।”
बोली माँ— “कहाँ से दूँ बाबूजी,
दही नहीं है घर में?
किससे मंगाऊँ दही,
कोई नहीं है घर में।”
उनका इतना मन देखकर,
दया नानी को आई।
वह गई पड़ोसन के घर,
माँग दही ले आई।
खाए फिर वे दही संग,
भरपेट खाना।
वे बोले— “दही हूँ खाया,
राजीव को मत बताना ।”
जाते जाते कह गए वे— “
— “इस बित्ते भर के पेट के लिए यहां आता मैं,
वरना तो है पैसा बहुत,
कहीं भी चला जाता मैं।”
बार-बार तबीयत बिगड़ती,
हम सब डर जाते थे।
हममें से कोई एक,
हरदम साथ में रहते थे।
बोले पिताजी माँ से —“जो खाऊँगा कहते हैं,
वह सब बनाकर दिया करो।
उनके खाने पीने पे तुम,
मनाही ना किया करो।”
बाजार का हो खाना,
या फिर बाहर हो जाना।
दादा हैं साथ हमारे,
तो किसी से क्या घबराना।
मारो जब जाना होता मुझको,
साथ लेकर दादाजी जाते थे।
कई बस छूट जाती पर,
मुझे साथ लिए बिन ना आते थे।
भैया बोले -“खट्टा मीठा ना देना उनको,
डॉक्टर ने मना किया है।
परहेज करने को बोले और
ये दवा दिया है।”
कई तरह की दवाईयां थी,
दादाजी खुद भूल जाते थे।
इसलिए दवाई निकाल मैं ही देती,
खाकर वे सो जाते थे।
मैं थी बहुत आलसी,
आठ बजे तक सोती थी।
चाय बनाने उठाते तीन बजे,
नींद में ही रोती थी।
सोते सोते ही स्टोव में चाय बनाती थी,
चाय बनाकर उनको देती फिर से सो जाती थी।
27 जून को बोले दादा पैसे देकर—
“जाओ, सामान मंगवाओ।
खीर-आलुचाप बनवाओ,”
खाए खीर वे 6 कटोरी ,
हो गई उनकी इच्छा पूरी।
पापा दादा को साथ बैठे,
हमने कभी ना देखा था।
पर उस दिन खाये वे साथ बैठकर,
हमने आँखो से देखा था।
अचानक पड़ी पिता की नजर दादा पे
—“बाबूजी ये क्या करते हैं?”
इतनी रात गए वे क्यूं,
नमाज पढ़ते हैं?”
हुआ फिर कुछ शक पापा को,
आवाज दिए दादा को।
हिलाकर उठाए तो,
हाथ-पैर सुन्न थी पड़ी हुई।
और आँखें ऊपर को
थी खुली हुई।
15 मिनट तक वैसे थे दादा,
हम भी डरे हुए थे।
बार बार दादा को,
आवाज लगा रहे थे।
फिर हाथों में हरकत हुई,
देखे वे हम सबको।
बोले— “समझ नहीं आता,
क्या होता है मुझको।”
उनकी हालत को सुनकर,
सब मारो से आ गए।
ईलाज कराने उनका,
रायपुर उनको ले गए।
जाने लगे जब रायपुर वे,
तो शीशा उन्होंने देख लिया।
वो शीशा हाथ से छूटकर,
उनके पैरों में गिर गया ।
बैठी थी मैं पास में ही,
मन हुआ प्रणाम कर लूँ उनको।
“शाम को तो आ जायेंगे, क्या प्रणाम करूँ,
ये सोच हुआ मुझको।”
कभी कभी रोते थे दादा,
दादी को याद वे करते थे।
मैं जाती जब पास तो,
दादी की बात वे करते थे।
कभी हम करते उनसे उन्ही की शिकायत ,
तो वे देते हमें हिदायत।
“मैं तो मर जाऊँगा एक दिन,
फिर तेरा क्या होगा?”
“ये देखने ना मै आऊँगा ।”
सुनकर उनकी बातें,
आँखे भर जाती थी।
जो भी बन पड़ता मुझसे,
वो सेवा ही कर पाती थी।
वे सोचते सभी मेरी बात मानें
और सेवा करें।
सबकी है परेशानी अपनी ,
कौन फिर उनका दुःख हरें।
अपनी जगह वे भी सही थे,
अपनी जगह हम भी सही थे।
किसी में किसी का दोष नहीं,
सब वक्त का खेल है, किसी से रोष नहीं।
करते थे वे सबसे प्रेम,
पर बताना ना आता था।
थी चिंता उनको सबकी,
पर जताना ना आता था।
कभी दीदियों, कभी भाभियों को,
सबको फोन लगाते थे।
फोन लगाकर वे उन सबका,
हाल-चाल पूछ लेते थे ।
मजाक करना आदत थी उनकी,
पर दिल के वे अच्छे थे।
बस बात अगर पैसे की हो तो,
थोड़े से वे कच्चे थे।
शाम 4 बजे मैं हाथों में,
मेहंदी लगाने बैठी थी।
उसी समय माँ और नानी,
सब्जी काटने बैठी थी।
तभी आया फोन पिता का,
बोले -“आ रहे लेकर बाबूजी को ।”
माँ बोली मुझे -“जा ठीक कर दे,
उनके बिस्तर को।”
बचा रखी थी मेहंदी मैंने,
दादाजी को जो पसंद थी।
मुझसे वे लगवाते मेहंदी,
उन्हे भाती इसकी सुगंध थी।
सोची थी -” दादाजी जी जब घर आयेंगे,
उनको हम मेहंदी लगाएंगे।”
रायपुर थे गए वे,
हम इंतजार कर रहे, दादाजी कब आयेंगे?
पिता का था फोन आया—
“अब वे कभी ना आएंगे…।”
जिस काले बैग को वे,
एक पल को दूर ना करते थे।
बिन उस बैग के,
कभी कहीं ना जाते थे ।
वह बैग आज लावारिस,
यूँ ही पड़ा हुआ था।
कौन उसकी कद्र करे,
कद्रदान खुद ही सोया हुआ था।
राजा जैसे आए थे,
राजा जैसे चले गए।
अपने पीछे पूरा भरा,
परिवार छोड़ गए ।
दादी गईं तब हम छोटे थे,
मौत ना कुछ समझते थे।
दादा गए तब लगा,
सब कुछ ही उजड़ गया।
जिनका हाथ था सिर के ऊपर,
वो भी अब छिन गया।
जिस बरगद की छाया में ,
हम सुरक्षित बैठे थे।
वो बरगद ही गिर गया,
हम गुमसुम से बैठे थे।
डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका”
छत्तीसगढ़



